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कोटद्वार में मीडिया पर रोक: क्या कानून अब बजरंगदल की मर्ज़ी से चलेगा?

कोटद्वार (उत्तराखंड)। उत्तराखंड के कोटद्वार में मीडिया के प्रवेश पर लगाया गया प्रतिबंध अब सिर्फ प्रशासनिक फैसला नहीं रह गया है, बल्कि यह कानून-व्यवस्था, पुलिस की निष्पक्षता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।

जहाँ एक ओर कथित तौर पर 100 से ज्यादा लोगों की भीड़ खुलेआम नारेबाज़ी, गाली-गलौज और धमकियों के साथ एक दुकानदार पर दबाव बनाती दिखाई दी, वहीं दूसरी ओर उत्तराखंड पुलिस द्वारा अब तक किसी भी व्यक्ति के खिलाफ FIR दर्ज नहीं की गई

वायरल वीडियो मौजूद, फिर भी पुलिस की चुप्पी

सोशल मीडिया पर वायरल कई वीडियो में साफ़ देखा जा सकता है कि—

  • कौन-कौन लोग मौके पर मौजूद थे
  • कौन मोहम्मद दीपक को गालियाँ और धमकियाँ दे रहा था
  • किस तरह दुकान के नाम को लेकर दबाव बनाया गया

इसके बावजूद पुलिस की ओर से कोई ठोस कार्रवाई सामने नहीं आई।
यह स्थिति यह सवाल खड़ा करती है कि क्या वीडियो सबूत अब कानून के दायरे में नहीं आते?

बजरंगदल की मांग और पुलिस की सहमति—चिंताजनक संकेत

वायरल फुटेज में यह भी सुनाई देता है कि बजरंगदल के कार्यकर्ता दुकानदार से नाम बदलने और मोहम्मद दीपक से माफ़ी मांगने की बात कर रही है।
सबसे गंभीर पहलू यह है कि मौके पर मौजूद पुलिस अधिकारी इन मांगों पर रोक लगाने के बजाय, उन्हें “सही” ठहराते हुए दिखाई देते हैं।

यह दृश्य यह संकेत देता है कि कानून का पालन कराने के बजाय पुलिस दबाव के आगे असहाय नज़र आ रही है

मीडिया पर रोक, हंगामा करने वालों को खुली छूट क्यों?

स्थिति बिगड़ने की आशंका का हवाला देकर मीडिया को कवरेज से रोका गया, लेकिन सवाल यह है कि—

  • हंगामा करने वालों पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
  • केवल मीडिया को ही पीछे हटने का आदेश क्यों दिया गया?

लोकतंत्र में मीडिया का काम सच्चाई दिखाना है। मीडिया को रोकना कहीं न कहीं सवालों से बचने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।

नाम के आधार पर दबाव: सामाजिक सौहार्द पर खतरा

दुकान के नाम को लेकर खड़ा किया गया विवाद केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं है।
यह उस सोच को दर्शाता है, जहाँ अब नाम देखकर धर्म तय करने की कोशिश की जा रही है
विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के दबाव समाज में डर और विभाजन का माहौल पैदा करते हैं।

उत्तराखंड पुलिस की भूमिका पर उठते सवाल

उत्तराखंड पुलिस से यह अपेक्षा की जाती है कि वह संविधान और कानून के अनुसार निष्पक्ष कार्रवाई करे।
लेकिन कोटद्वार की घटना में पुलिस की निष्क्रियता यह सवाल खड़ा करती है कि—

  • क्या पुलिस स्वतंत्र रूप से निर्णय ले पा रही है?
  • या फिर सत्ता और संगठनों के दबाव में कार्रवाई से बचा जा रहा है?

जवाबदेही तय होगी या नहीं?

कोटद्वार की यह घटना अब सिर्फ स्थानीय मामला नहीं रह गई है।
यह पूरे प्रदेश में कानून-व्यवस्था और अभिव्यक्ति की आज़ादी को लेकर एक बड़ी बहस का विषय बन चुकी है।

सबसे बड़ा सवाल यही है—
क्या कानून सभी के लिए बराबर है, या फिर कुछ के लिए अलग नियम हैं?

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