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माकणे का ‘प्रमोशन’ या सिस्टम का ‘मजाक’? कर्तव्यों से किनारा, भ्रष्टाचार के संरक्षण में माकणे का ‘हुनर’

मुंबई: मुंबई में एक अजीब चलन चल पड़ा है—जितनी कम आप ईमानदारी दिखाएंगे, उतना ही ऊंचा आपका प्रमोशन होगा! ‘वशिष्ठ वाणी’ आज आपको एक ऐसे ‘अद्भुत’ अधिकारी से मिलवा रहा है, जिनका नाम है म.वि. माकणे। माकणे साहब की कार्यशैली का लोहा तो खुद ‘डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम फेडरेशन’ के पदाधिकारी मानते हैं, जिन पर माकणे साहब हमेशा ‘मेहरबान’ रहे।

4 महीने की ‘लंबी छुट्टी’ और ‘एक’ कार्रवाई का दिखावा!

फेडरेशन द्वारा किए जा रहे अवैध निर्माणों की शिकायतों पर माकणे साहब को जागने में पूरे 4 महीने का समय लग गया। और जब जगे भी, तो सिर्फ एक अवैध निर्माण को ढहाकर और 1 लाख 8 हजार रुपये का जुर्माना लगाकर ऐसा दिखावा किया जैसे कोई बहुत बड़ा ‘इतिहास’ रच दिया हो। हकीकत तो यह है कि उस कार्रवाई के बाद भी माकणे साहब उन अवैध निर्माण करने वालों को बचाने के खेल में जुट गए।

‘FIR का झूठा वादा’ और माकणे साहब का ‘फेवरेट राग’

जब ‘वशिष्ठ वाणी’ के मालिक और प्रकाशक अभिषेक अनिल वशिष्ठ ने माकणे से सीधा सवाल किया कि “इतनी धांधली के बाद भी FIR क्यों नहीं?”, तो माकणे का रटा-रटाया जवाब होता था— “बस दो दिन में मालवणी पुलिस को लेटर लिख रहा हूँ!” यह ‘दो दिन’ का चक्रव्यूह आज तक नहीं टूटा। न FIR हुई, न कोई ठोस कार्रवाई, बस माकणे साहब का तबादला हो गया और फिर आया ‘शानदार प्रमोशन’।

पार्किंग का खेल और सुरक्षा की बलि: माकणे साहब का ‘पुराना पैटर्न’

माकणे साहब की ‘दरियादिली’ केवल एक वाकये तक सीमित नहीं है, यह एक सोची-समझी कार्यप्रणाली है। अवैध पार्किंग के मामले में फेडरेशन के पदाधिकारियों को बचाना इनका पुराना शगल रहा है। याद कीजिए, जब माकणे साहब ने फेडरेशन के अध्यक्ष और सचिव को नोटिस जारी कर ’24 घंटे के भीतर’ आपातकालीन रास्तों (Emergency Exits) से सभी वाहन हटाने का फरमान सुनाया था।

उस समय तो जैसे लगा कि कोई बड़ी कार्रवाई होने वाली है, लेकिन वह ’24 घंटे’ कई महीने में तब्दील हो चुके हैं और अवैध पार्किंग का साम्राज्य जस का तस है। हकीकत यह है कि नोटिस तो सिर्फ एक ढोंग था, ताकि मामला मीडिया की नजरों से ठंडा पड़ जाए। फेडरेशन ने उसी नोटिस की आड़ में और भी मजबूती से कब्जा जमा लिया और सभी सोसायटियों को यह फरमान जारी कर दिया कि ‘पार्किंग का जो भी बकाया है, वह वसूल किया जाए।’

एक अधिकारी के लिए, जिसे जनता की सुरक्षा सुनिश्चित करनी थी, वह खुलेआम अवैध निर्माण माफियाओं का ‘कवच’ बनकर खड़ा रहा। क्या माकणे साहब के लिए जनता की जान, इन ‘धर्म के व्यापारियों’ द्वारा की जा रही अवैध वसूली से भी सस्ती है? FIR दर्ज करने का इनका वादा भी वैसा ही निकला, जैसा इनका ’24 घंटे’ का नोटिस—खोखला और केवल कागजी!

7 जुलाई: अब कोर्ट में होगा ‘माकणे पुराण’ का हिसाब!

भ्रष्टाचार को संरक्षण देने और कर्तव्यों से मुंह मोड़ने के इस खेल के खिलाफ ‘वशिष्ठ वाणी’ के मालिक अभिषेक अनिल वशिष्ठ ने अब कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। 7 जुलाई को इस मामले की सुनवाई है। सवाल यह है कि जिस अधिकारी को सस्पेंड होना चाहिए था, उसे प्रमोशन कैसे मिला? क्या सिस्टम में ईमानदारी अब केवल किताबों की चीज रह गई है?

वशिष्ठ वाणी का सवाल: क्या भ्रष्ट अधिकारियों को प्रमोट करना ही अब BMC की नई कार्यसंस्कृति है? जनता अपने टैक्स के पैसे से इनकी सैलरी भरती है, ताकि ये हमारी सुरक्षा करें, न कि अवैध निर्माण माफियाओं के लिए ‘शील्ड’ बनकर खड़े हों।

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