लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहलाने वाली मीडिया आज एक गंभीर आत्ममंथन के दौर से गुजर रही है। सवाल यह नहीं है कि सत्ता में कौन बैठा है, सवाल यह है कि जो व्यवस्था जनता के सरोकारों को उठाने के लिए बनाई गई थी, वह आज चाटुकारिता के गलियारों में कैसे खो गई है?
आज देश का नागरिक पूछता है—’अच्छे दिन’ का वह वादा कहाँ खो गया? महंगाई, बेरोजगारी और जनकल्याण के मुद्दों पर केंद्रीय मंत्रियों से तीखे सवाल पूछने के बजाय, मुख्यधारा की मीडिया का एक बड़ा वर्ग केवल प्रधानमंत्री की प्रशंसा में अपनी ऊर्जा खर्च कर रहा है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टिप्पणी को लेकर जिस तरह की ‘अति-उत्साहित’ कवरेज देखने को मिली, उसने पत्रकारिता के न्यूनतम मानकों को भी सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया है। जहाँ अंतरराष्ट्रीय मीडिया उस टिप्पणी को एक व्यंग्य के रूप में देख रहा था, वहीं हमारे यहाँ का एक वर्ग उसे ‘अचीवमेंट’ बताकर अपनी पीठ थपथपाने में लगा था।

• लेख: अभिषेक अनिल वशिष्ठ •
(वशिष्ठ मीडिया हाउस प्राइवेट लिमिटेड के चेयरमैन एवं समूह दैनिक समाचार पत्र के स्वामी/प्रकाशक)
क्या मीडिया ने कभी यह साहस दिखाया कि जब प्रधानमंत्री मोदी, डोनाल्ड ट्रंप से मिल रहे थे, तो उनसे यह कड़ा सवाल पूछा जाए कि उस दौरान हमारे तीन जवान शहीद हो गए थे? क्या उस मुलाकात में उन शहीदों का मुद्दा उठाना उचित नहीं था? राष्ट्रवाद का ढोल पीटने वाली मीडिया तब मौन क्यों थी? यह शर्मनाक है कि जब देश शोक में था, तब मीडिया केवल ‘अतिथ्य’ और ‘तारीफों’ के पुल बांधने में व्यस्त थी।
यह केवल एक मीडिया संस्थान का नहीं, बल्कि संपूर्ण पत्रकारिता के चरित्र के पतन का संकेत है। ‘न खाऊंगा, न खाने दूंगा’ के नारे से लेकर राम मंदिर के चंदे के हिसाब तक, ऐसे कई ज्वलंत मुद्दे हैं जो जनता के मन में हैं, लेकिन मीडिया के ‘प्राइम टाइम’ से गायब हैं।
राजनीति और मीडिया के बीच की धुंधली होती रेखा ने लोकतंत्र को कमजोर किया है। जब सत्ता के गलियारों में ‘तोड़-फोड़’ की राजनीति को ‘विकास’ का नाम दिया जाता है, तो मीडिया का काम उसका पर्दाफाश करना था, न कि उसका मौन समर्थन। जनता यह सब देख रही है; वह समझ रही है कि मुद्दों से भटकाने का यह खेल अब पुराना हो चुका है।
समय आ गया है कि मीडिया अपनी आत्मा को फिर से टटोले। क्या वह सत्ता का प्रहरी बनकर जनता की आवाज बनेगी या फिर इतिहास में ‘गुलाम मीडिया’ के तौर पर दर्ज होगी? पत्रकारिता का धर्म शासक को खुश करना नहीं, बल्कि शासक को आईना दिखाना है। यदि मीडिया अपना यह धर्म भूल चुकी है, तो उसे यह याद रखना चाहिए कि इतिहास और जनता, दोनों ही बहुत सख्त न्यायाधीश होते हैं।














