लोकप्रिय विषयमहाराष्ट्रसम्पादकीयकवितास्वास्थ्यअपराधअन्यवीडियो

संपादकीय: आस्था के पावन कलश में ‘भ्रष्टाचार’ का जहर; यह केवल चोरी नहीं, विश्वासघात है!

• लेखअभिषेक अनिल वशिष्ठ •
(वशिष्ठ मीडिया हाउस प्राइवेट लिमिटेड के चेयरमैन एवं समूह दैनिक समाचार पत्र के स्वामी/प्रकाशक)


भारतीय जनमानस में राम मंदिर केवल एक ढांचे का नाम नहीं है, यह करोड़ों लोगों की वर्षों की तपस्या, संघर्ष और बलिदान की प्रतिमूर्ति है। जिस पवित्र स्थल को राष्ट्र की अस्मिता का प्रतीक माना गया, आज उसी के गर्भगृह के आसपास से चढ़ावे में हेराफेरी की खबरें आ रही हैं। यह समाचार किसी के लिए भी केवल एक अपराध की सूचना नहीं, बल्कि हृदय को झकझोर देने वाला एक ‘विश्वासघात’ है। जब रक्षक ही भक्षक बन जाएं, तो समाज का नैतिक ढांचा चरमराने लगता है।

अंदरूनी सेंधमारी: जब ‘अपने’ ही खरोंचने लगें आस्था को

इस पूरे प्रकरण का सबसे दुखद और शर्मनाक पहलू यह है कि यह ‘चोरी’ किसी बाहरी तत्व ने नहीं, बल्कि मंदिर की व्यवस्था के भीतर बैठे लोगों ने की है। यह उन लोगों का दुस्साहस है जिन्होंने या तो जिम्मेदारी का अर्थ नहीं समझा, या फिर सत्ता के मद में वे यह भूल गए कि राम मंदिर के प्रति लोगों की निष्ठा कितनी गहरी है। क्या उन लोगों को रत्ती भर भी अहसास है कि जिस दान के साथ उन्होंने खिलवाड़ किया है, वह देश के सबसे गरीब और आस्थावान व्यक्ति की गाढ़ी कमाई है?

सवालों के कटघरे में ‘ट्रस्ट’ और सरकारी मौन

आज जब पूरे देश की नजरें अयोध्या पर हैं, तब मंदिर ट्रस्ट का रवैया बेहद निराशाजनक है। प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) द्वारा रिपोर्ट मांगे जाने के बावजूद, ट्रस्ट का यह कहना कि ‘SIT जांच कर रही है, इसलिए फिलहाल रिपोर्ट नहीं दे सकते’, पारदर्शिता पर एक बड़ा सवालिया निशान लगाता है। क्या SIT को ढाल बनाकर जनता की जवाबदेही से भागना, खुद को कानून से ऊपर समझने का संकेत नहीं है?

प्रधानमंत्री की ‘चुप्पी’ और राजनीतिक विरोधाभास

सबसे बड़ा प्रश्न आज ‘न खाऊंगा, न खाने दूंगा’ का नारा देने वाले प्रधानमंत्री की चुप्पी पर है। जिस राम मंदिर के निर्माण के हर चरण में उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई और श्रेय लिया, आज उसी मंदिर में व्याप्त भ्रष्टाचार पर उनकी मौन सहमति क्या दर्शाती है? क्या ED और CBI जैसी एजेंसियां केवल राजनीतिक विरोधियों के लिए हैं?

यही स्थिति मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव से जुड़े कथित जमीन विवाद में भी दिख रही है। जब सत्ता के गलियारों में भ्रष्टाचार की गूंज सुनाई दे रही हो और शीर्ष नेतृत्व ‘मौन’ साधे बैठा हो, तो यह ‘डॉ. मनमोहन सिंह के युग’ के दोहराव जैसा प्रतीत होता है। क्या अब समय आ गया है कि राष्ट्र यह मान ले कि भ्रष्टाचार के विरुद्ध ‘जीरो टॉलरेंस’ का दावा केवल चुनावी मंचों की शोभा है?

निष्कर्ष: जनता का धैर्य और इतिहास की अदालत

इतिहास गवाह है कि जब-जब सत्ता और व्यवस्था ने आस्था की गरिमा को ठेस पहुंचाई है, तब-तब जनता ने अपने आक्रोश से व्यवस्था को बदलना सीखा है। ट्रस्ट का अहंकार और सरकार की चुप्पी—ये दोनों ही संकेत शुभ नहीं हैं। यह केवल पैसे का मामला नहीं है, यह उस ‘नैतिक अनुबंधन’ (Moral Contract) का अंत है जो राम भक्तों और मंदिर प्रशासन के बीच था।

यदि समय रहते इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष और उच्च-स्तरीय (CBI/ED) जांच नहीं हुई, तो आने वाली पीढ़ियां इस दौर को ‘आस्था के साथ हुए सबसे बड़े मजाक’ के रूप में याद रखेंगी। ‘वशिष्ठ वाणी’ चेतावनी देता है कि भ्रष्टाचार को संरक्षण देने की यह नीति राष्ट्र के सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर सकती है। अब वक्त है कि प्रधानमंत्री इस चुप्पी को तोड़ें और दोषियों को बेनकाब करें। क्योंकि अगर राम के नाम पर ‘राम’ को ही लूटा जा रहा है, तो फिर न्याय की आशा किससे की जाए?

Join WhatsApp

Join Now

Leave a Comment