
• लेख: अभिषेक अनिल वशिष्ठ •
(वशिष्ठ मीडिया हाउस प्राइवेट लिमिटेड के चेयरमैन एवं समूह दैनिक समाचार पत्र के स्वामी/प्रकाशक)
राजनीति का यह शाश्वत नियम रहा है कि जब भी कोई क्रांति अपनी आहुति देकर सफलता के शिखर पर पहुँचती है, तो उसकी वेदी पर लहू बहाने वाले पीछे छूट जाते हैं और किनारे पर खड़े दर्शक मुकुट पहन लेते हैं। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा आज इसी राजनैतिक यथार्थ का एक जीवंत उदाहरण बनकर उभरा है। इस पूरे घटनाक्रम के शांत होते ही जिस तरह से कुछ स्वयंभू संगठन और अवसरवादी चेहरे इस फैसले को अपनी ‘रणनीतिक विजय’ घोषित करने की होड़ में लगे हैं, वह न केवल हास्यास्पद है, बल्कि उन हजारों अज्ञात युवाओं के त्याग का अपमान भी है जिन्होंने सत्ता के दमन को अपने जिस्म पर सहा।
इतिहास कभी बंद कमरों और वातानुकूलित गेस्ट हाउसों की बैठकों से नहीं बदलता। जब जंतर-मंतर की तपती धूप में व्यवस्था ने अपना विकराल रूप दिखाया, जब छात्रों के बनाए अस्थायी शेड उखाड़ फेंके गए और पूरी रात उन्हें अंधेरे में धकेल दिया गया, तब किसी राजनीतिक पार्टी का घोषणापत्र या किसी स्वयंभू नेता की वाकपटुता काम नहीं आ रही थी। उस विकट परिस्थिति में यदि कोई खड़ा था, तो वह इस देश का युवा था—जिसके एक हाथ में अपने भविष्य की अनिश्चितता का भय था और दूसरे हाथ में अन्याय के खिलाफ़ उठने वाला संकल्प। लाठियाँ उन मासूम कंधों पर बरसी थीं, दर्द उन आँखों में था और संघर्ष की उस ज्वाला को जलाए रखने की जिद्द भी उसी युवा शक्ति की थी।
सवाल यह उठता है कि संकट के उन क्षणों में वे लोग कहाँ थे जो आज जीत के सबसे बड़े दावेदार बनकर उभरे हैं? जब 19 जुलाई को पर्यावरणविद् सोनम वांगचुक को जंतर-मंतर से हटाया गया और 20 जुलाई को सड़कों पर छात्रों का खून बहा, तब मंच पर हुंकार भरने वाले और अमेरिका से सीधे क्रांति का संदेश लेकर आने वाले ये ‘नायक’ मैदान से पूरी तरह ओझल थे। जो नेतृत्व संघर्ष की सबसे भयावह रात में युवाओं के साथ ज़मीन पर सोने का साहस न जुटा सके, वह प्रभात होते ही जीत का श्रेय लेने की पहली पंक्ति में कैसे खड़ा हो सकता है? सत्ता भी जानती है और समाज भी कि यह इस्तीफा किसी प्रायोजित मंच के दबाव में नहीं आया, बल्कि यह उस जनआक्रोश का नतीजा था जो लाठियों के प्रहार से दबने के बजाय और अधिक प्रखर होता चला गया।
जब व्यवस्था को यह अहसास हो गया कि डर की सीमा समाप्त हो चुकी है और अब दमन का हर चक्र युवाओं के इरादों को और मजबूत कर रहा है, तब जाकर सत्ता को अपने कदम पीछे खींचने पड़े। परंतु यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस बेखौफ संघर्ष की गाथा को कुछ परजीवी संगठन अपनी ढाल बनाकर इस्तेमाल कर रहे हैं। जिस तरह ‘अल्लाह मेहरबान तो गधा पहलवान’ की कहावत चरितार्थ होती दिख रही है, उससे एक बात तो साफ है कि इतिहास भले ही चकाचौंध वाले चेहरों को याद रखने का भ्रम पाले, लेकिन सच यही रहेगा कि यह बदलाव किसी पार्टी की नीति का परिणाम नहीं, बल्कि युवाओं के अटूट धैर्य और निडर स्वाभिमान की स्वाभाविक परिणति है। क्रेडिट की इस दौड़ में चाहे कोई कितना भी चिल्ला ले, इतिहास की कलम से यह सच कभी मिटाया नहीं जा सकेगा।














