
• लेख: अभिषेक अनिल वशिष्ठ •
(वशिष्ठ मीडिया हाउस प्राइवेट लिमिटेड के चेयरमैन एवं समूह दैनिक समाचार पत्र के स्वामी/प्रकाशक)
हम एक ऐसे जीवंत लोकतंत्र के नागरिक हैं जहाँ संविधान ने हर व्यक्ति को बराबरी और न्याय का मौलिक अधिकार दिया है। इस लोकतांत्रिक व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए शासकीय तंत्र में पुलिस बल को ‘सुरक्षा और कानून के निष्पक्ष पालन’ का सबसे मजबूत स्तंभ माना गया है। विशेषकर मुंबई पुलिस—जिसे दशकों से अपनी पेशेवर निष्ठा, दक्षता और अपराध पर नियंत्रण के लिए ‘सर आँखों पर’ बैठाकर रखा गया। एक वक्त था जब सड़कों पर खाकी वर्दी की मौजूदगी ही आम इंसान के भीतर सुरक्षा और न्याय की उम्मीद जगा देती थी।
लेकिन जब वही संस्थागत ढांचा धीरे-धीरे अपनी बुनियादी नैतिक जवाबदेही (Accountability) से मुंह मोड़ने लगे, तो सवाल सिर्फ किसी एक ढिलाई का नहीं रह जाता—सवाल उस गहरी प्रशासनिक सड़न का बन जाता है जो जनता के भरोसे की जड़ों को खोखला कर रही है।
🏛️ जब प्रकाशक के आरटीआई को थमा दिया जाए टालमटोल का कागज़!
सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम देश के नागरिकों के हाथों में पारदर्शी शासन सुनिश्चित करने का सबसे बड़ा संवैधानिक हथियार रहा है। विचार कीजिए, जब ‘वशिष्ठ मीडिया हाउस’ का चेयरमैन और समाचार पत्रों का स्वामी/प्रकाशक होने के नाते, जब मैं खुद एक गंभीर सार्वजनिक मामले में विधि-सम्मत तरीके से सवाल पूछता हूँ—और उसके जवाब में पुलिस तंत्र से केवल गोलमोल बहाने, दायित्वहीन उत्तर और टालमटोल की मुद्रा देखने को मिलती है, तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं।
सोचने योग्य गंभीर प्रश्न यह है: यदि देश के चौथे स्तंभ (मीडिया) के जिम्मेदार प्रतिनिधियों और प्रकाशकों के साथ पुलिस प्रशासन ऐसा सतही और गैर-जिम्मेदाराना रवैया अपना सकता है, तो किसी दूर-दराज़ से आए आम, निरक्षर या साधारण नागरिक के साथ ये अधिकारी कैसा सलूक करते होंगे? क्या उनकी शिकायतों को कचरे के डिब्बे में फेंक दिया जाता होगा?
🎭 ट्रांसफर: कार्रवाई का विकल्प या दाग छुपाने की आड़?
किसी भी प्रशासनिक व्यवस्था में जब अधिकारी अपने कर्तव्य में घोर लापरवाही (Dereliction of Duty) करते हैं, तो नियम-कानून के तहत कठोर अनुशासनात्मक या विभागीय कार्रवाई की अपेक्षा की जाती है। लेकिन मालवणी पुलिस स्टेशन से जुड़े हालिया घटनाक्रम में हमने देखा कि शिकायतों और आरटीआई के माध्यम से उठे सवालों का जवाब देने के बजाय अधिकारियों के तबादले (Transfers) का रास्ता चुन लिया गया।
जाँच अधिकारी से लेकर मालवणी के वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों तक का ट्रांसफर कर देना क्या वाकई कोई समाधान है?
- क्या तबादला कोई ऐसा ‘वॉशिंग मशीन’ है, जिसमें जाते ही 3-3 महीने तक फाइलों को दबाकर रखने का पाप धुल जाता है?
- क्या ट्रांसफर कर देने से कानून की अवहेलना करने वाले अधिकारियों की प्रशासनिक जिम्मेदारी खत्म हो जाती है?
कार्रवाई के नाम पर सिर्फ तबादले का यह ठप्पा साफ दर्शाता है कि व्यवस्था अपने अधिकारियों पर शिकंजा कसने के बजाय उन्हें सुरक्षित रास्ता देने में जुटी है। यह कानून के इकबाल पर एक गहरी चोट है।
⚖️ “कोई जवाबदेही नहीं”—यह भाव लोकतंत्र के लिए खौफनाक है!
आज सबसे चिंताजनक बात किसी प्रक्रियात्मक देरी की नहीं है; सबसे खतरनाक है पुलिस तंत्र के भीतर घर कर चुकी यह मानसिकता कि “हम किसी के प्रति जवाबदेह नहीं हैं, हम जो चाहेंगे वही करेंगे।”
जब एक सरकारी विभाग की आधिकारिक रिपोर्ट के बावजूद महीनों तक प्राथमिक कदम न उठाए जाएं, आरटीआई में पूछे गए मूल सवालों को दरकिनार करके केवल “कोर्ट जाइए” जैसी सलाहें बाँटी जाएं, तो यह स्पष्ट संदेश देता है कि शासकीय तंत्र का अहंकार अपने चरम पर है।
जब रक्षक ही कानून के पन्नों को धत्ता बताने लगें और सूचना मांगने पर लीपापोती का कागज़ थमाने लगें, तो समाज में एक गहरा खौफ पैदा होता है। यह खौफ अपराधियों का नहीं, बल्कि उस लाचारी का है जहाँ नागरिक यह महसूस करने लगता है कि न्याय का रास्ता अब पूरी तरह बंद हो चुका है।
🚨 समय है आत्ममंथन और कड़े सुधारों का
पुलिस बल का आभामंडल उसकी वर्दी से नहीं, जनता के भीतर उसके प्रति मौजूद ‘विश्वास’ से बनता है। यदि जवाबदेही का भाव इसी तरह खत्म होता रहा, तो खाकी से जनता का भरोसा हमेशा के लिए उठ जाएगा।
महाराष्ट्र पुलिस के शीर्ष नेतृत्व, माननीय पुलिस महानिदेशक (DGP) और मुंबई पुलिस आयुक्त से यह विनम्र किन्तु बेहद स्पष्ट आग्रह है कि वे इस ढर्रे का संज्ञान लें। अधिकारियों की मनमानी पर केवल स्थानांतरण का पर्दा न डाला जाए, बल्कि आरटीआई का मज़ाक उड़ाने और कर्तव्यों से भागने वाले अधिकारियों पर अनुशासनात्मक जाँच बिठाई जाए।
क्योंकि जब तक व्यवस्था में ‘जवाबदेही’ और ‘डर’ का संतुलन वापस कायम नहीं होगा, तब तक न्याय की उम्मीद केवल कागज़ों तक ही सीमित रह जाएगी।













