
• लेख: अभिषेक अनिल वशिष्ठ •
(वशिष्ठ मीडिया हाउस प्राइवेट लिमिटेड के चेयरमैन एवं समूह दैनिक समाचार पत्र के स्वामी/प्रकाशक)
लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि यहां जनता अपने शासकों से सवाल पूछ सकती है। सरकार की आलोचना कर सकती है, वादों का हिसाब मांग सकती है और अपनी नाराज़गी खुलकर व्यक्त कर सकती है। लेकिन लोकतंत्र की यही ताकत तब कमजोर पड़ जाती है, जब तर्कों की जगह गालियां और विचारों की जगह व्यक्तिगत अपमान ले लेता है।
हाल ही में जंतर-मंतर पर परीक्षा पेपर लीक के विरोध में प्रदर्शन के दौरान कुछ युवाओं द्वारा देश के प्रधानमंत्री और उनकी दिवंगत माता के लिए जिस प्रकार की अभद्र भाषा का प्रयोग किया गया, उसने केवल राजनीतिक बहस को नहीं, बल्कि हमारी सामाजिक संस्कृति को भी कटघरे में खड़ा कर दिया। किसी भी लोकतांत्रिक समाज में यह स्वीकार्य नहीं हो सकता कि असहमति व्यक्त करने के नाम पर व्यक्तिगत गरिमा की सारी सीमाएं तोड़ दी जाएं।
नाराज़गी होना स्वाभाविक है। बेरोज़गारी, पेपर लीक, महंगाई, भ्रष्टाचार, प्रशासनिक लापरवाही या सरकार के अधूरे वादों को लेकर लोगों के मन में सवाल उठना भी स्वाभाविक है। स्वयं हम भी अनेक विषयों पर सरकार से असहमत रहे हैं। “ना खाऊंगा, ना खाने दूंगा” जैसे वादों पर सवाल उठाना हो, भ्रष्टाचार के मामलों पर कार्रवाई की अपेक्षा हो, छोटे और स्वतंत्र मीडिया के सामने बढ़ती चुनौतियों की चिंता हो, या फिर जनता के मुद्दों पर अधिक संवेदनशील संवाद की मांग—इन सभी विषयों पर लोकतांत्रिक तरीके से सवाल पूछना हर नागरिक का अधिकार है।
लेकिन अधिकार और मर्यादा साथ-साथ चलते हैं।
व्यंग्य कीजिए, कटाक्ष कीजिए, तीखी आलोचना कीजिए, तथ्यों के साथ सरकार को आईना दिखाइए—यही पत्रकारिता और लोकतंत्र की आत्मा है। परंतु जब भाषा इतनी गिर जाए कि उसमें केवल अपमान रह जाए, तब वह लोकतांत्रिक विरोध नहीं, बल्कि अपनी ही बात की गंभीरता को कमज़ोर करने का माध्यम बन जाती है।
यह भी याद रखना चाहिए कि प्रधानमंत्री का पद किसी एक दल का नहीं, बल्कि भारत गणराज्य का संवैधानिक पद है। आज इस पद पर कोई भी व्यक्ति हो, उसके प्रति असहमति व्यक्त की जा सकती है, लेकिन उसके सम्मान की संवैधानिक मर्यादा भी बनी रहनी चाहिए। किसी के परिवार, विशेषकर दिवंगत माता-पिता को अपशब्द कहना न तो बहादुरी है और न ही लोकतंत्र की जीत।
सोचिए, यदि हम अपनी बात तर्क से मनवा सकते हैं, तो गालियों की आवश्यकता क्यों पड़े? यदि हमारे पास तथ्य हैं, तो अशोभनीय शब्दों का सहारा क्यों लें? इतिहास गवाह है कि विचारों ने साम्राज्य बदले हैं, गालियों ने नहीं।
आज सोशल मीडिया के दौर में भाषा पहले से अधिक जिम्मेदारी मांगती है। एक वीडियो, एक पोस्ट या एक नारा कुछ ही मिनटों में पूरी दुनिया तक पहुंच जाता है। ऐसे में किसी भारतीय द्वारा अपने ही प्रधानमंत्री के लिए अशोभनीय भाषा का प्रयोग केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि भारत की लोकतांत्रिक संस्कृति और हमारे युवाओं की छवि का भी प्रश्न बन जाता है।
हमें ऐसी पीढ़ी तैयार करनी होगी जो सवाल पूछने से न डरे, लेकिन सवाल पूछते समय अपनी भाषा का स्तर भी बनाए रखे। जो सरकार की गलतियों पर चुप न बैठे, लेकिन अपने शब्दों से अपनी संस्कृति का भी सम्मान करे।
लोकतंत्र की असली ताकत शोर में नहीं, बल्कि सार्थक संवाद में है। जो शब्द समाज को जोड़ें, वही भविष्य बनाते हैं; जो शब्द केवल अपमान पैदा करें, वे अंततः समाज को ही कमज़ोर करते हैं।
आइए, हम विरोध की संस्कृति को जीवित रखें, लेकिन मर्यादा की कीमत पर नहीं।
क्योंकि शब्द केवल आवाज़ नहीं होते, वे हमारे संस्कार, हमारे चरित्र और हमारे राष्ट्र की पहचान भी होते हैं।














