
• लेख: अभिषेक अनिल वशिष्ठ •
(वशिष्ठ मीडिया हाउस प्राइवेट लिमिटेड के चेयरमैन एवं समूह दैनिक समाचार पत्र के स्वामी/प्रकाशक)
लोकतांत्रिक व्यवस्था में जब सत्ता और नीति का हर मार्ग एक ही केंद्र बिंदु की ओर अग्रसर होता है, तब विफलता की स्थिति में किसी अधीनस्थ मोहरे की बलि देकर मुख्य नेतृत्व को दोषमुक्त नहीं किया जा सकता। भारतीय प्रशासनिक और राजनीतिक परिदृश्य में यह एक स्थाई परिपाटी बन चुकी है कि जब भी किसी जन-सरोकार से जुड़ी योजना में कोई गंभीर दरार आती है, तो एक त्वरित राजनीतिक विसर्जन (इस्तीफा) कराकर पूरे तंत्र को गंगा-स्नान करा दिया जाता है। वर्तमान में देश के युवाओं के भविष्य को निगलने वाले ‘पेपर लीक’ जैसे जघन्य प्रकरणों पर भी यही घिसा-पिटा फॉर्मूला लागू करने की चेष्टा हो रही है। विभागीय मंत्री के इस्तीफे की मांग करना एक तात्कालिक और सतही समाधान मात्र हो सकता है, किंतु यह उस बुनियादी बीमारी का उपचार नहीं है जिसकी जड़ें शीर्ष नेतृत्व के पूर्ण नियंत्रण में निहित हैं।
यह एक सर्वविदित तथ्य है कि विगत वर्षों में ‘केंद्रीकृत कमान’ के तहत ही समस्त राष्ट्रीय निर्णयों, ऐतिहासिक परियोजनाओं और यहाँ तक कि धार्मिक आस्था के प्रतीकों के भव्य निर्माण का संपूर्ण श्रेय (क्रेडिट) केवल एक शीर्ष चेहरे को अर्पित किया गया। जब देश ने ‘प्रधान सेवक’ और ‘देश का चौकीदार’ जैसे शीर्ष पदों के संकल्पों पर अडिग विश्वास जताया, तो स्वाभाविक रूप से तंत्र की हर विफलता और सुरक्षात्मक चूक की नैतिक जवाबदेही भी उसी सर्वोच्च शिखर पर जाकर ठहरती है। फिर चाहे वह राष्ट्र के करोड़ों सनातनी हिंदुओं की आस्था के केंद्र राम मंदिर में सुरक्षा व चढ़ावे से जुड़ी विसंगतियों का अत्यंत संवेदनशील विषय हो, या फिर विभिन्न राज्यों में केंद्रीय अनुशंसा पर नियुक्त किए गए मुख्यमंत्रियों के कार्यकाल में उभरते भूमि घोटालों और प्रशासनिक शिथिलता के गंभीर आरोप हों। इन सभी मोर्चों पर शीर्ष नेतृत्व की रहस्यमयी चुप्पी लोकतांत्रिक शुचिता पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगाती है।
इस पूरे परिदृश्य में, लद्दाख की दुर्गम वादियों से लेकर राजधानी की सीमाओं तक देश की अस्मिता और पर्यावरण की रक्षा के लिए अनवरत संघर्षरत सोनम वांगचुक जैसे प्रखर विचारक आज करोड़ों में एक रत्न की भांति चमक रहे हैं। उनका 11 दिनों का कठोर अनशन उनके अदम्य साहस और देश के प्रति अटूट निष्ठा का साक्षात प्रमाण है। किंतु, ‘वशिष्ठ वाणी’ का यह स्पष्ट मत है कि केवल पारंपरिक धरने और अनशन से व्यवस्था का यह अभेद्य दुर्ग नहीं हिलने वाला। अब समय आ गया है कि इस जन-आंदोलन को एक नई, वैज्ञानिक और नीतिगत रणनीति की दिशा में मोड़ा जाए। यह लड़ाई किसी एक मोहरे या मंत्री को बदलने की नहीं, बल्कि उस पूरी व्यवस्था की जवाबदेही तय करने की होनी चाहिए जिसके शीर्ष पर बैठकर संपूर्ण नियंत्रण का दावा किया जाता है। जब तक देश का प्रबुद्ध नागरिक और युवा वर्ग इस प्रशासनिक विफलता की मूल जड़ को नहीं पहचानेगा, तब तक केवल चेहरों को बदलने का यह सियासी स्वांग यूं ही चलता रहेगा। लोकतंत्र का तकाजा है कि सवाल हमेशा राजा से पूछा जाए, प्यादों से नहीं।














