डॉटम ग्रुप (Dotom Group) के कथित बेकाबू शोर से त्रस्त जनता, शिकायतों के बावजूद कार्रवाई नदारद मुंबई | विशेष संवाददाता देश की आर्थिक राजधानी मुंबई एक बार फिर प्रशासनिक निष्क्रियता को लेकर सवालों के घेरे में है। डॉटम ग्रुप (Dotom Group) द्वारा कथित रूप से फैलाए जा रहे बेकाबू शोर ने स्थानीय नागरिकों का जीना मुश्किल कर दिया है। दिन-रात जारी तेज़ आवाज़ों से आम लोग मानसिक तनाव, अनिद्रा और स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे हैं, लेकिन हैरानी की बात यह है कि बार-बार शिकायतों के बावजूद मुंबई पुलिस और प्रशासन की ओर से कोई ठोस कार्रवाई होती नहीं दिख रही। स्थानीय निवासियों का कहना है कि सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो वास्तविक स्थिति की तुलना में बहुत कम भयावह हैं। हकीकत में हालात कहीं ज़्यादा गंभीर हैं। बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है, बुज़ुर्गों को आराम नहीं मिल पा रहा और बीमार लोग सबसे ज़्यादा परेशान हैं। 🚨 मलाड पश्चिम में Dotom बिल्डर का शोर आतंक जारीस्थानीय लोगों के अनुसार Dotom के कर्मचारियों का कहना है —“शिकायत तो रोज़ हो रही है, पर काम रुकेगा नहीं।”यानी लोगों की तकलीफ़ इनके लिए सिर्फ मज़ाक!वीडियो में दिख रही मशीन की आवाज़ से आसपास की इमारतें कंप रही हैं,बच्चे,… https://t.co/6r3ZZb0mmV pic.twitter.com/0OftTJOkDb— SANSAD VANI – Hindi News (@SVNEWS_MAH) January 9, 2026 शिकायतें हुईं, परिणाम शून्य नागरिकों के अनुसार, शोर को लेकर उन्होंने कई बार स्थानीय पुलिस थाने में शिकायत दर्ज कराई। इसके अलावा ऑनलाइन शिकायत पोर्टल और सोशल मीडिया के माध्यम से भी संबंधित अधिकारियों को अवगत कराया गया। मीडिया में मामला उठने के बावजूद ज़मीनी स्तर पर कोई असर नहीं दिखा। लोगों का सवाल है कि जब शिकायतें, वीडियो और प्रत्यक्ष सबूत सामने हैं, तो कार्रवाई क्यों नहीं हो रही? क्या कानून सिर्फ़ काग़ज़ों तक सीमित रह गया है? कानून सबके लिए बराबर या सिर्फ़ आम आदमी के लिए? डॉटम ग्रुप का इस तरह खुलेआम नियमों की अनदेखी करना यह धारणा मज़बूत कर रहा है कि कानून आम नागरिकों के लिए सख़्त है, जबकि बड़े बिल्डरों और कॉर्पोरेट समूहों के सामने सिस्टम बेबस नज़र आता है। जनता के बीच यह चर्चा आम हो चुकी है कि अगर किसी के पास पैसा, पावर या राजनीतिक पहुंच नहीं है, तो उसकी शिकायतों की कोई अहमियत नहीं रह जाती। डर और बेबसी का माहौल ग्राउंड रिपोर्ट बताती है कि लोग खुलकर बोलने से भी डर रहे हैं। कई नागरिकों को आशंका है कि शिकायत करने पर कहीं उन्हें ही परेशान न किया जाए। एक स्थानीय निवासी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा,“शोर से जीना मुश्किल है, लेकिन शिकायत करने पर लगता है कि उल्टा हमें ही परेशानी न झेलनी पड़े।” मीडिया उठाती रहेगी सवाल मीडिया का कहना है कि वह जनता की आवाज़ को दबने नहीं देगा। सवाल उठाना और जवाब मांगना लोकतंत्र में मीडिया की बुनियादी ज़िम्मेदारी है। जब तक शोर पर रोक और जिम्मेदारों पर कार्रवाई नहीं होती, तब तक यह मुद्दा उठाया जाता रहेगा। सबसे बड़ा सवाल क्या मुंबई पुलिस आम नागरिकों की सुरक्षा और अधिकारों की रक्षा करने में विफल हो रही है?क्या बड़े नाम और बड़ा पैसा कानून से ऊपर हो चुका है? आज यह मामला सिर्फ़ एक ग्रुप या एक इलाके का नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम पर सवाल है।क्योंकि जब जनता की आवाज़ अनसुनी रह जाती है, तो लोकतंत्र की नींव कमजोर होने लगती है। Post navigation आज की बड़ी खबर: उत्तर प्रदेश में 24 IPS अधिकारियों का तबादला मुंबई की हाउसिंग सोसाइटियों की मनमानी पर सवाल, मलाड की NLANJANA सोसायटी बना विवाद का केंद्र