नई दिल्ली/वशिष्ठ वाणी।
राज्यसभा की कार्यवाही सोमवार को उस समय अत्यधिक विवादित हो गई, जब आम आदमी पार्टी (आप) के वरिष्ठ नेता और सांसद संजय सिंह ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) पर ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण और गंभीर आरोप लगाए।
सिंह ने दावा किया कि 1949 में आरएसएस ने भारत के राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ को अपनाए जाने का विरोध किया था और अपने मुखपत्र ‘ऑर्गनाइज़र’ में इसे “मनोरंजन का आइटम” बताया था।
उनका लगभग 22 मिनट का भाषण तथ्यों, दस्तावेज़ों और ऐतिहासिक संदर्भों के हवाले से भरा हुआ था, जिसके चलते सदन में तीखी बहस छिड़ गई और विपक्षी दलों ने जोरदार समर्थन किया।
“क्या आप जानते हैं कि आरएसएस ने राष्ट्रगान का विरोध किया था?” — संजय सिंह
अपने संबोधन की शुरुआत में संजय सिंह ने संविधान सभा के ऐतिहासिक फैसले का उल्लेख करते हुए कहा—
- 24 जनवरी 1950 को ‘जन गण मन’ को आधिकारिक राष्ट्रगान घोषित किया गया।
- इसके ठीक छह दिन बाद, 30 जनवरी 1950 को ‘ऑर्गनाइज़र’ में संपादकीय प्रकाशित हुआ, जिसमें लिखा गया कि यह गीत “राष्ट्रगान बनने योग्य नहीं है” और केवल “मनोरंजन का साधन” है।
सिंह ने उस संपादकीय की प्रति सदन में दिखाते हुए कहा—
“आज जो लोग देशभक्ति का प्रमाणपत्र बाटते हैं, उन्होंने कभी राष्ट्रगान को ही नकार दिया था।”
क्रांतिकारियों का हवाला देकर RSS की भूमिका पर सवाल
संजय सिंह ने अपने भाषण में स्वतंत्रता संग्राम के नायकों का उल्लेख करते हुए कहा—
- भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, चंद्रशेखर आज़ाद जैसे क्रांतिकारी
फांसी चढ़ते हुए “वंदे मातरम” और “इंकलाब जिंदाबाद” के नारे लगाते थे। - “लेकिन आरएसएस का कोई स्वयंसेवक आजादी की लड़ाई के दौरान जेलों में नहीं दिखा।”
उन्होंने महात्मा गांधी के एक कथन का उल्लेख करते हुए कहा—
“गांधी जी ने माना था कि वंदे मातरम का पहला दोहा हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक है, लेकिन आरएसएस ने इसे हमेशा सांप्रदायिक चश्मे से देखा।”
बीजेपी पर सीधा निशाना: “राष्ट्रवाद का दोहरा मापदंड”
संजय सिंह ने BJP को घेरते हुए कहा—
“आज बीजेपी वंदे मातरम को अनिवार्य करने की बात करती है, जबकि उनके ही संगठन ने राष्ट्रगान का विरोध किया था। यह राष्ट्रवाद नहीं, राजनीति है।”
उन्होंने कहा कि इतिहास को तोड़-मरोड़कर जनता के सामने प्रस्तुत करना लोकतांत्रिक व्यवस्था और संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ है।
सोशल मीडिया पर बहस तेज — समर्थन और विरोध दोनों की बाढ़
संजय सिंह द्वारा एक्स (ट्विटर) पर शेयर किए गए भाषण के वीडियो ने सोशल मीडिया पर जोरदार प्रतिक्रिया पैदा की—
- 25,000+ व्यूज
- 1,300+ लाइक्स
- 500+ रीपोस्ट
- सैकड़ों कमेंट
समर्थकों ने इसे “तथ्य आधारित और साहसिक” भाषण बताया।
वहीं आलोचकों ने इसे “वोटबैंक की राजनीति और इतिहास को चयनित रूप से पेश करने की कोशिश” बताया।
इतिहास क्या कहता है?
उपलब्ध ऐतिहासिक दस्तावेज़ों और अभिलेखों के अनुसार—
- 1949 में ‘ऑर्गनाइज़र’ में प्रकाशित संपादकीय ‘जन गण मन’ को राष्ट्रगान के रूप में अस्वीकार्य बताता है।
- लेख में “वंदे मातरम को राष्ट्रगान बनाया जाए” यह सुझाव भी दर्ज है।
- 1948 में गांधी हत्या के बाद आरएसएस पर प्रतिबंध लगाया गया था, जिसे 1949 में हटाया गया।
RSS अपनी ओर से यह दावा करता रहा है कि वह राष्ट्रवादी संगठन रहा है और स्वतंत्रता आंदोलन के बाद सामाजिक कार्यों में सक्रिय रहा है।
राजनीतिक विश्लेषण: क्या विपक्ष का नया मुद्दा?
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार—
- विपक्ष आगामी चुनावों तक इस मुद्दे को लगातार उठाएगा।
- संजय सिंह का यह भाषण विपक्ष की रणनीति का हिस्सा है, जिसमें ऐतिहासिक दस्तावेज़ों को आधार बनाकर बीजेपी और आरएसएस पर हमला किया जा रहा है।
बीजेपी ने आधिकारिक बयान नहीं दिया है, लेकिन पार्टी सूत्रों ने इसे “पुराने रिकॉर्ड के नाम पर राजनीतिक हमले की कोशिश” बताया है।
निष्कर्ष
राज्यसभा में उठा यह मुद्दा
‘वंदे मातरम बनाम जन गण मन’,
आरएसएस की ऐतिहासिक भूमिका,
और राष्ट्रवाद के राजनीतिक उपयोग
पर एक नई राष्ट्रीय बहस को जन्म दे चुका है।
सोशल मीडिया की गर्मी और विपक्ष की आक्रामकता को देखते हुए, यह विवाद जल्द थमता नहीं दिख रहा।


