क्या म्हाडा कार्यालय में अधिकांश अधिकारी भ्रष्टाचार ही हैं?
मुंबई/वशिष्ठ वाणी। यह सवाल आज सामना नगर, मालवणी गेट नंबर–8 के रहवासियों के बीच ही नहीं, बल्कि पूरे मुंबई क्षेत्र निर्माण विभाग की कार्यप्रणाली पर उठता नजर आ रहा है।

सामना नगर मालवणी गेट नंबर–8 पर एक व्यक्ति द्वारा तथाकथित फेडरेशन बनाकर म्हाडा की उस खाली जमीन पर 7 से 8 वर्षों तक अवैध पार्किंग कराई गई, जो आपातकाल में फायर ब्रिगेड के वाहनों के आवागमन का एकमात्र रास्ता है। हैरानी की बात यह है कि फेडरेशन के अध्यक्ष और सचिव ने न केवल अवैध रूप से पार्किंग करवाई, बल्कि वाहन मालिकों से बाकायदा पार्किंग शुल्क की वसूली भी की।

म्हाडा द्वारा नोटिस जारी होने के बाद भले ही अवैध वसूली बंद हो गई हो, लेकिन अवैध पार्किंग आज भी जस की तस जारी है।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि यह पूरी जानकारी म्हाडा क्षेत्र निर्माण विभाग, गोरेगांव को वर्षों से है—फिर भी कार्रवाई से अधिकारी लगातार बचते नजर आए।
नए अधिकारी, पुरानी चुप्पी?
म्हाडा में कई अधिकारियों के तबादले हुए, लेकिन जिन नए वरिष्ठ अधिकारी संतोष कांबले की तैनाती हुई, उनसे भी लोगों को कोई राहत मिलती नहीं दिख रही।
स्थानीय नागरिकों और मीडिया द्वारा अवैध पार्किंग, अवैध गार्डन और अवैध निर्माण की जानकारी देने के बावजूद कांबले न तो मौके पर पहुंचे, न कोई ठोस कार्रवाई की।
अब सवाल उठता है—
👉 क्या कांबले भी कार्रवाई से इसलिए बच रहे हैं क्योंकि सिस्टम यही सिखाता है?
👉 या फिर वह भी “मकाने की तरह” सिर्फ कुर्सी संभालने आए हैं, व्यवस्था सुधारने नहीं?
‘रोहित शिंदे से बात करो’—क्या यही जवाब है?
जब भी म्हाडा अधिकारी संतोष कांबले से सवाल किया जाता है, उनका एक ही रटा-रटाया जवाब होता है—
“रोहित शिंदे से बात करो।”
सामना नगर मालवणी में यह बात किसी से छुपी नहीं है कि रोहित शिंदे फेडरेशन के तथाकथित ‘नारदमुनि’ माने जाते हैं।
आरोप है कि वह कार्रवाई करने के बजाय फेडरेशन के अध्यक्ष और सचिव को पहले ही सूचना दे देते हैं, ताकि अवैध गतिविधियों पर पर्दा डाला जा सके।
अब बड़ा सवाल यह है—
👉 क्या अधिकारी कांबले स्वतंत्र रूप से निर्णय लेते हैं या जो रोहित शिंदे कहते हैं, वही अंतिम आदेश बन जाता है?
चाय-पानी की संस्कृति और अवैध गार्डन
स्थानीय लोगों का आरोप है कि “चाय-पानी” की संस्कृति के चलते रोहित शिंदे ने मालवणी ओम सिद्धविनायक सोसायटी को अवैध गार्डन निर्माण की मौन अनुमति दे दी।
यह अनुमति कागजों में नहीं, बल्कि भरोसे के रूप में दी गई—
“अगर कोई शिकायत करेगा, तो आंख-कान बंद कर दिए जाएंगे।”
जब अधिकारी खुद आंख-कान बंद कर लें, तो
👉 ब्लू-प्रिंट दिखाने का क्या मतलब?
👉 लिखित शिकायत देने का क्या फायदा?

तबादले हुए, लेकिन रोहित शिंदे क्यों नहीं?
म्हाडा के कई वरिष्ठ अधिकारियों का तबादला कर दिया गया, लेकिन रोहित शिंदे अब भी अपने पद पर जमे हुए हैं।
यह संयोग है या सिस्टम की मजबूरी—इस पर भी सवाल उठ रहे हैं।
👉 क्या विभाग को यह भरोसा है कि “रोहित शिंदे हैं तो चाय-पानी का जुगाड़ चलता रहेगा”?
👉 या फिर ईमानदारी की कीमत सिर्फ तबादला है, और रसूख की इनाम कुर्सी?
कटाक्ष नहीं, चेतावनी है
यह रिपोर्ट किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने का नहीं, बल्कि सिस्टम से सवाल पूछने का प्रयास है।
अगर आज भी म्हाडा अधिकारी आंख मूंदे बैठे रहे, तो कल यही अवैध पार्किंग और अवैध निर्माण किसी बड़ी दुर्घटना का कारण बन सकता है।
अब सवाल सिर्फ भ्रष्टाचार का नहीं, बल्कि जनता की सुरक्षा का है।

