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मुंबई/वशिष्ठ वाणी। महाड़ा कार्यालय में होने वाली सोसाइटी सुनवाई अब न्याय से ज्यादा “औपचारिकता” बनती जा रही है — ऐसा आरोप कई सोसाइटी प्रतिनिधियों और नागरिकों ने लगाया है।

कहा जा रहा है कि महाड़ा के उपनिमंत्रक बी एस कटरे द्वारा कई बार सुनवाई की तारीखें निर्धारित की जाती हैं, लेकिन निर्धारित दिन पर वे स्वयं उपस्थित नहीं होते। लोग दूर-दराज़ से, कई बार दूसरे जिलों से, खर्च और समय लगाकर महाड़ा कार्यालय पहुंचते हैं — और वहां पहुंचने के बाद उन्हें एक पत्र थमा दिया जाता है:

“आपकी अगली तारीख यह है…”

सवाल यह है —
क्या यही है प्रशासनिक संवेदनशीलता?
क्या जनता का समय कोई मायने नहीं रखता?


एक बार नहीं, कई बार का आरोप

सूत्रों के अनुसार, यह घटना किसी एक दिन की नहीं है। कई मामलों में सुनवाई की तारीख दी गई, पक्षकार उपस्थित हुए, लेकिन अधिकारी नदारद रहे।

जब नागरिक समय पर पहुंचते हैं और कुर्सी खाली मिलती है, तो यह केवल अनुपस्थिति नहीं — बल्कि व्यवस्था की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह है।

तकनीक के इस युग में — फोन, संदेश, ईमेल — सब उपलब्ध हैं। फिर पहले से सूचना क्यों नहीं?

क्या प्रशासन का दायित्व नहीं कि वह नागरिकों को अनावश्यक असुविधा से बचाए?


कटघरे में व्यवस्था, फिर भी कुर्सी पर वही चेहरा?

बी.एस. कटरे के संदर्भ में यह भी चर्चा है कि उनके खिलाफ विभिन्न स्तरों पर शिकायतें और प्रक्रियाएं लंबित बताई जाती रही हैं।

ऐसे में बड़ा सवाल यह उठता है कि:

  • क्या मंत्रालय के पास कोई और अधिकारी नहीं है जो इन सुनवाइयों को समयबद्ध और पारदर्शी ढंग से संभाल सके?
  • जब किसी अधिकारी पर स्वयं प्रश्न उठ रहे हों, तो क्या उन्हें उसी समय संवेदनशील जिम्मेदारी पर बैठाए रखना प्रशासनिक विवेक कहलाएगा?

हालांकि, इस संबंध में आधिकारिक स्तर पर कोई सार्वजनिक स्पष्टीकरण सामने नहीं आया है।


न्याय या औपचारिकता?

सुनवाई का मतलब केवल “डेट देना” नहीं होता।
सुनवाई का मतलब है — पक्षों को सुनना, समाधान देना, विवाद खत्म करना।

लेकिन जब सुनवाई की तारीख तो हो और सुनने वाला ही न हो, तो यह न्याय प्रक्रिया का मज़ाक नहीं तो और क्या है?

कई नागरिकों का कहना है कि:

  • यात्रा का खर्च
  • काम का नुकसान
  • मानसिक तनाव

इन सबकी भरपाई कौन करेगा?


सरकार से सीधे सवाल

महाड़ा मंत्रालय के अधीन आता है।
तो सवाल मंत्रालय से भी है:

  • क्या मंत्रालय को इन घटनाओं की जानकारी है?
  • यदि है, तो कार्रवाई क्या हुई?
  • क्या जवाबदेही तय की गई?
  • क्या वैकल्पिक व्यवस्था बनाई गई?

या फिर यह मान लिया गया है कि जनता इंतजार करती रहे — और सिस्टम अपनी गति से चले?


“सिस्टम फेलियर” या “सुविधाजनक चुप्पी”?

जब बार-बार एक ही प्रकार की स्थिति सामने आए, तो उसे संयोग नहीं कहा जा सकता।

प्रशासनिक व्यवस्था का मूल सिद्धांत है — जवाबदेही।
लेकिन यहां तस्वीर उलटी दिखाई देती है:

जनता समय पर, अधिकारी अनुपस्थित।
जनता इंतजार में, फाइलें लंबित।
जनता सवाल पूछे, जवाब खामोश।


समाधान क्या?

विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी स्थिति से बचने के लिए:

  • सुनवाई स्थगित होने पर पूर्व सूचना अनिवार्य की जाए
  • अनुपस्थिति की स्थिति में वैकल्पिक अधिकारी नियुक्त किया जाए
  • डिजिटल हियरिंग की व्यवस्था लागू की जाए
  • और अनुपस्थित रहने पर प्रशासनिक समीक्षा हो

क्योंकि न्याय केवल “कुर्सी” से नहीं, “जिम्मेदारी” से मिलता है।


अंतिम सवाल

  • अगर सुनवाई की कुर्सी पर बैठा व्यक्ति स्वयं विवादों में घिरा हो —
  • अगर तारीखें तय हों लेकिन उपस्थिति तय न हो —
  • अगर जनता को केवल अगली तारीख मिले, समाधान नहीं —

तो फिर यह व्यवस्था किसके लिए है?

महाड़ा को और मंत्रालय को अब स्पष्ट जवाब देना होगा।
क्योंकि जनता अब केवल तारीख नहीं — जवाब चाहती है।

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