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पहले भटकते थे गोवंश, अब मिल रहा आश्रय

मुख्यमंत्री निराश्रित गोवंश सहभागिता योजना से पशुपालकों को आर्थिक सहारा

वाराणसी: जो गोवंश कभी सड़कों और खेतों में भटकते नजर आते थे, आज उन्हें आश्रय और संरक्षण मिल रहा है। उत्तर प्रदेश सरकार की पहल ने न केवल इन बेजुबान पशुओं को सहारा दिया है, बल्कि किसानों और पशुपालकों के जीवन में भी नई उम्मीद जगाई है।

मुख्यमंत्री निराश्रित गोवंश सहभागिता योजना के माध्यम से गोवंशों को अपनाने वाले पशुपालकों को सरकार आर्थिक सहायता प्रदान कर रही है। वाराणसी समेत पूरे प्रदेश में यह योजना प्रभावी रूप से लागू की जा रही है। वाराणसी में अब तक 1755 पशुपालकों को 3769 निराश्रित गोवंश सुपुर्द किए जा चुके हैं, जिससे गोवंश संरक्षण और पशुपालन को बढ़ावा मिल रहा है।

मुख्य पशु चिकित्साधिकारी डॉ. आलोक कुमार सिंह के अनुसार इस योजना के तहत प्रत्येक गोवंश के लिए पशुपालक को 1500 रुपये प्रतिमाह की आर्थिक सहायता दी जाती है। एक पशुपालक अधिकतम चार गोवंशों को संरक्षित कर सकता है। इस प्रकार उसे प्रति माह 6000 रुपये तक की सहायता मिलती है, जो साल भर में 72,000 रुपये तक पहुंच जाती है। यह राशि डीबीटी (Direct Benefit Transfer) के माध्यम से सीधे पशुपालकों के बैंक खातों में भेजी जाती है।

इस योजना का लाभ केवल आर्थिक सहायता तक सीमित नहीं है। जिन किसानों और गोपालकों ने इन गोवंशों को अपनाया है, उन्हें दूध, गोबर और जैविक खाद के रूप में अतिरिक्त लाभ भी मिल रहा है। गोबर से तैयार जैविक खाद खेतों की उर्वरता बढ़ाने में मदद करती है, जिससे खेती की लागत घटती है और उत्पादन बेहतर होता है।

ग्रामीण क्षेत्रों में कई परिवारों के लिए यह योजना आय का स्थायी स्रोत बनती जा रही है। जहां पहले निराश्रित गोवंश किसानों के लिए परेशानी का कारण बनते थे, वहीं अब वही गोवंश उनके लिए आर्थिक सहारा और कृषि सहयोगी बन रहे हैं।

गोवंश संरक्षण की यह पहल न केवल पशु कल्याण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का भी प्रभावी माध्यम बनती जा रही है।

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