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वशिष्ठ वाणी विशेष: सिर्फ शिक्षा मंत्री का इस्तीफा क्यों? देश के ‘प्रधान’ का इस्तीफा क्यों नहीं? करोड़ों में एक ‘सोनम वांगचुक’ केवल धरना नहीं, अब रणनीति बदलें!

वाराणसी/नई दिल्ली: देश में जब भी कोई बड़ी गड़बड़ी या घोटाला होता है, तो किसी एक मंत्री का इस्तीफा कराकर पूरे मामले पर पर्दा डाल दिया जाता है। आज पेपर लीक मामले में अगर शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा दे भी दें, तो इसकी क्या गारंटी है कि कल आने वाला नया मंत्री इस व्यवस्था को पूरी तरह साफ कर देगा? जब हर योजना, हर विकास और हर सफलता का पूरा श्रेय अकेले प्रधानमंत्री लेते हैं, तो व्यवस्था की हर नाकामी, पेपर लीक और धार्मिक स्थलों पर हुई गड़बड़ियों की सीधी जिम्मेदारी भी प्रधानमंत्री की ही बनती है।

‘वशिष्ठ वाणी’ आज देश के सामने यह बड़ा सवाल उठा रहा है कि आखिर हर नाकामी पर प्रधानमंत्री की चुप्पी क्यों है?

1. ‘क्रेडिट’ प्रधानमंत्री का, तो ‘फेलियर’ की जिम्मेदारी किसकी?

पिछले कुछ वर्षों में देश ने ‘सबका साथ, सबका विकास’, ‘ना खाऊंगा, ना खाने दूंगा’ और ‘मैं देश का चौकीदार हूं’ जैसे बड़े-बड़े नारे सुने। लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है:

  • योजनाओं से लेकर मंदिर तक सिर्फ एक चेहरा: नोटबंदी से लेकर राम मंदिर के निर्माण और उद्घाटन तक, हर चीज का पूरा श्रेय प्रधानमंत्री ने खुद लिया।
  • चढ़ावा चोरी पर चुप्पी क्यों?: सनातनी धर्म और करोड़ों हिंदुओं की आस्था के केंद्र राम मंदिर में जब चढ़ावा चोरी जैसी गंभीर घटनाएं सामने आती हैं, तो पूरा देश स्तब्ध रह जाता है। जिस मंदिर के निर्माण का पूरा श्रेय प्रधानमंत्री को जाता है, वहां हुई ऐसी सुरक्षा चूक और धांधली पर उनकी जवाबदेही क्यों तय नहीं होनी चाहिए? क्यों इस गंभीर विषय पर पूरी सरकार शांत बैठी है?

2. मुख्यमंत्रियों का चयन और भ्रष्टाचार के आरोप

प्रधानमंत्री ने अपने नेतृत्व में जिन राज्यों में नए चेहरों को मुख्यमंत्री की गद्दी सौंपी, वहां की कानून-व्यवस्था और प्रशासन पर लगातार सवाल उठ रहे हैं:

  • जमीन घोटाले और लचर प्रशासन: मध्य प्रदेश से लेकर ओडिशा तक, जिन मुख्यमंत्रियों को केंद्र के भरोसे सत्ता मिली, उन पर जमीन घोटालों से लेकर प्रशासनिक विफलता के गंभीर आरोप लग रहे हैं।
  • विफल नेतृत्व: प्रधानमंत्री का केंद्रीकृत नेतृत्व हर मोर्चे पर फेल साबित हो रहा है, क्योंकि जमीन पर काम करने वाले जनप्रतिनिधियों के पास न तो कोई दूरदर्शिता है और न ही जनता के प्रति कोई वास्तविक जवाबदेही।

3. सोनम वांगचुक के लिए ‘वशिष्ठ वाणी’ का नया विजन: केवल धरना नहीं, रणनीति बदलें

सोनम वांगचुक देश के उन गिने-चुने रत्नों में से हैं जो करोड़ों में एक होते हैं। देश के भविष्य और पर्यावरण के लिए उनका 11 दिनों से जारी धरना उनकी अटूट निष्ठा को दिखाता है। लेकिन ‘वशिष्ठ वाणी’ का यह मानना है कि उन्हें अब अपनी रणनीति बदलने की जरूरत है:

  • इस्तीफे नहीं, जड़ पर प्रहार हो: सिर्फ मंत्रियों के इस्तीफे की मांग के लिए अनशन करने के बजाय, एक ऐसी देशव्यापी मुहिम और रणनीति तैयार की जानी चाहिए जो सीधे प्रधानमंत्री और उनकी पूरी कैबिनेट को कटघरे में खड़ा करे।
  • जनता को जगाने का आंदोलन: जब तक देश का युवा और आम नागरिक यह नहीं समझेगा कि इस पूरे मिस-मैनेजमेंट के असली जिम्मेदार शीर्ष पर बैठे लोग हैं, तब तक मंत्रियों को बदलने का यह सियासी खेल यूं ही चलता रहेगा।

‘वशिष्ठ वाणी’ का निष्कर्ष

अब समय आ गया है कि देश छोटी-मोटी राजनीतिक रोटियां सेकने वालों और केवल गुमराह करने वाले बयानों को दरकिनार करे। अगर जवाबदेही तय होनी है, तो वह सबसे बड़े पद से शुरू होनी चाहिए। धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा इस बीमारी का इलाज नहीं है; असली इलाज उस नेतृत्व से सवाल करना है जिसने ‘चौकीदार’ होने का वादा किया था।

“जो देश नहीं दिखाता, वो दिखाता है वशिष्ठ वाणी। हम बिना किसी डर के, पूरी निष्पक्षता और नियम-कानून के साथ सीधे सत्ता के शीर्ष से सवाल पूछते रहेंगे।”

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