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वशिष्ठ वाणी विशेष: E-20 पेट्रोल का ‘सच्चा सच’—जिम्मेदारी किसकी, सवाल किससे और जनता परेशान क्यों?

नई दिल्ली/वाराणसी: देश भर में इस समय E-20 (20% इथेनॉल मिश्रित) पेट्रोल को लेकर हाहाकार मचा हुआ है। नई और पुरानी गाड़ियों के इंजन खराब होने, माइलेज घटने और जनता की जेब पर अतिरिक्त बोझ पड़ने की खबरें लगातार सामने आ रही हैं। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस पूरी नीति का असली कर्ता-धर्ता कौन है? सोशल मीडिया पर जिस तरह सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी को इस मुद्दे पर घेरा जा रहा है, क्या वह वाकई सच है या असली जिम्मेदार चेहरों को छुपाने की कोशिश?

‘वशिष्ठ वाणी’ आज सरकारी नियमों और मंत्रालयों के कामकाज के आधार पर इस पूरे खेल का पर्दाफाश कर रहा है।

1. असली डिसीजन मेकर कौन? हरदीप सिंह पुरी और प्रधानमंत्री का रोल

जनता को यह समझना होगा कि देश में ईंधन (फ्यूल) की नीति, उसकी सप्लाई, उसकी कीमतें और उसकी क्वालिटी तय करने का अधिकार सड़क परिवहन मंत्रालय के पास नहीं है।

  • पेट्रोलियम मंत्रालय की मुख्य जिम्मेदारी: पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने का पूरा प्रोजेक्ट केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी के ‘पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय’ के अधीन आता है। तेल कंपनियों (IOCL, BPCL, HPCL) को क्या निर्देश देने हैं, यह पूरी तरह इसी मंत्रालय के हाथ में है।
  • प्रधानमंत्री और कैबिनेट का अंतिम फैसला: इथेनॉल ब्लेंडिंग का लक्ष्य साल 2030 से घटाकर 2025-26 करने और इथेनॉल की सरकारी दरें तय करने का अंतिम निर्णय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली कैबिनेट कमेटी (CCEA) ने लिया था।

साफ है कि नीति लाने, लागू करने और रेट तय करने का पूरा निर्णय प्रधानमंत्री और पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी का है।

2. नितिन गडकरी का नाम क्यों उछाला जा रहा है? क्या है उनके बेटों का सच?

सोशल मीडिया और यूट्यूब थंबनेल्स पर हर जगह नितिन गडकरी का चेहरा दिखाकर उन्हें बदनाम किया जा रहा है। आइए इसके पीछे का सच जानते हैं:

  • मंत्रालय का काम: नितिन गडकरी ‘सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री’ हैं। उनका काम सिर्फ इतना है कि वे ऑटोमोबाइल कंपनियों को ‘फ्लेक्स-फ्यूल’ (ज्यादा इथेनॉल झेलने वाले) इंजन बनाने के लिए नियम जारी करें। पेट्रोल की सप्लाई से उनका कोई लेना-देना नहीं है।
  • इथेनॉल बिजनेस का सच: यह सच है कि नितिन गडकरी के बेटों की कंपनियां (जैसे स्यान एग्रो और मानस एग्रो) चीनी और इथेनॉल बनाती हैं। लेकिन तथ्यों के मुताबिक, देश के कुल इथेनॉल उत्पादन में उनकी हिस्सेदारी मात्र 0.07% है। बाकी का 99% से ज्यादा उत्पादन देश की अन्य 550 से अधिक कंपनियां और चीनी मिलें करती हैं। इसलिए, पूरी राष्ट्रीय नीति को सिर्फ एक परिवार के फायदे से जोड़ना पूरी तरह से भ्रामक और सनसनीखेज नैरेटिव है।

3. जनता को धोखा क्यों? गाड़ी निर्माताओं और सरकार से कड़े सवाल

‘वशिष्ठ वाणी’ इस रिपोर्ट के माध्यम से जनता की तरफ से सरकार और नीति निर्माताओं से सीधे सवाल पूछता है:

  • पहले व्यापक जांच क्यों नहीं हुई? जब भारत की सड़कों पर करोड़ों गाड़ियां ऐसी थीं जिनके इंजन केवल सामान्य पेट्रोल के लिए बने थे, तो बिना व्यापक स्तर पर गाड़ियों की टेस्टिंग किए E-20 पेट्रोल को हर जगह अनिवार्य क्यों कर दिया गया?
  • गाड़ी कंपनियों पर पहले सख्ती क्यों नहीं? सरकार ने जब यह नीति बनाई, तो उसी वक्त ऑटोमोबाइल कंपनियों को यह आदेश क्यों नहीं दिया गया कि वे पहले दिन से ही E-20 कंपैटिबल इंजन बनाना शुरू करें? पहले ईंधन बाजार में आ गया और कंपनियां इंजन बाद में बदल रही हैं—इस मिस-मैनेजमेंट का खामियाजा आम जनता क्यों भुगते?
  • जनता की गाड़ियों के नुकसान की भरपाई कौन करेगा? आज जिन आम नागरिकों की गाड़ियों के फ्यूल पंप, पिस्टन और इंजन इस फ्यूल की वजह से खराब हो रहे हैं, उनके नुकसान की जिम्मेदारी न तो तेल कंपनियां ले रही हैं और न ही कोई मंत्रालय।

‘वशिष्ठ वाणी’ का निष्कर्ष

ई-20 ईंधन के जरिए विदेशी मुद्रा बचाना और पर्यावरण को ठीक करना एक अच्छा राष्ट्रीय उद्देश्य हो सकता है, लेकिन इसे लागू करने की जल्दबाजी और लचर प्लानिंग ने आम जनता को परेशानी में डाल दिया है। सोशल मीडिया पर नितिन गडकरी को निशाना बनाकर असली नीति निर्माताओं यानी पेट्रोलियम मंत्रालय और कैबिनेट को सवालों के घेरे से बाहर रखना पत्रकारिता नहीं है।

जनता को सच जानना होगा—सप्लाई और रेट का फैसला हरदीप सिंह पुरी और कैबिनेट का है, और तकनीकी कमियों का जवाब भी उन्हीं को देना होगा।

“जो देश नहीं दिखाता, वो दिखाता है वशिष्ठ वाणी। हम निष्पक्षता और नियम-कानून के साथ हर सच आपके सामने लाते रहेंगे।”

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