मुंबई, मालाड: कहा जाता है कि कानून की आँखें अंधी होती हैं, लेकिन मुंबई नगर निगम (BMC) के अधिकारियों की आँखें शायद ‘चेहरा’ देखकर काम करती हैं। वशिष्ठ वाणी की हालिया रिपोर्ट ने जिस कड़वे सच से पर्दा उठाया था, जमीनी हकीकत उससे भी बदतर नजर आ रही है। दावा किया गया था कि मुंबई के सिग्नल बैनर मुक्त होंगे, लेकिन हकीकत यह है कि आज मालाड के सिग्नलों पर ट्रैफिक लाइट से ज्यादा नेताओं के मुस्कुराते चेहरे नजर आ रहे हैं।
सिग्नल ही क्यों? विज्ञापन के और भी हैं रास्ते
सवाल यह उठता है कि जब डिजिटल इंडिया के दौर में विज्ञापन के दर्जनों तरीके मौजूद हैं, तो ये बैनर सिग्नलों पर ही क्यों टांगे जाते हैं? जवाब साफ है—जबरन दृश्यता (Forced Visibility)। लाल बत्ती पर खड़ा हर नागरिक मजबूरन उन चेहरों को देखता है। यह विज्ञापन नहीं, बल्कि इलाके में अपनी ‘धाक’ जमाने का एक घटिया तरीका है, जो ट्रैफिक सेफ्टी को ताक पर रखकर किया जा रहा है।
कार्रवाई का ‘चेहरा’ देखकर फैसला
आम आदमी अगर अपनी दुकान का छोटा सा बोर्ड बिना इजाजत लगा दे, तो BMC का दस्ता तुरंत हाजिर हो जाता है। लेकिन जब बात बड़े नेताओं के जन्मदिन या शक्ति प्रदर्शन की आती है, तो अधिकारियों को शायद मोतियाबिंद हो जाता है। क्या मालाड के इन सिग्नलों पर चढ़े बैनर इस बात का सबूत हैं कि प्रशासन और रसूखदारों के बीच मलाई का खेल चल रहा है?
“जब रक्षक ही भक्षक बन जाएं और कानून की धज्जियां उड़ाने वाले ही कानून बनाने वाले हों, तो आम जनता किससे उम्मीद करे?”
क्या ऐसे बनेगा ‘खूबसूरत मालाड’?
नेताओं के भाषणों में ‘स्मार्ट सिटी’ और ‘खूबसूरत मुंबई’ के सपने तो खूब सजाए जाते हैं, लेकिन क्या प्लास्टिक के इन अवैध बैनरों और तार-तार होते सिग्नलों के बीच मालाड कभी खूबसूरत बन पाएगा?
- सड़कों पर दृश्यता शून्य: मुड़ने वाले रास्तों और सिग्नलों पर बैनर की वजह से दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ गया है।
- प्रशासनिक लाचारी: बॉम्बे हाई कोर्ट के सख्त आदेशों के बावजूद BMC का ‘लाइसेंस विभाग’ फाइलें दबाकर बैठा है।
निष्कर्ष:
अगर वशिष्ठ वाणी की रिपोर्ट के बाद भी संख्या बढ़ने के बजाय घट नहीं रही, तो यह साफ है कि अधिकारियों के लिए ‘नेताओं की जी-हजुरी’ जनता की सुरक्षा से ऊपर है। अब समय आ गया है कि जनता सीधे इन ‘पोस्टर बॉयज’ से सवाल करे कि क्या उनकी राजनीति सिर्फ खंभों और सिग्नलों तक ही सीमित है?














