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विशेष विश्लेषण: क्या लोकतंत्र का चौथा स्तंभ ‘वीआईपी’ व्यवस्था से छोटा है?

विशेष संवाददाता

नई दिल्ली। भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) के राष्ट्रीय राजमार्ग शुल्क नियमों की अनुसूची पर यदि बारीकी से दृष्टि डाली जाए, तो यह व्यवस्थागत विसंगति अत्यंत स्पष्ट रूप से उभरकर सामने आती है। वर्तमान नियमों के अंतर्गत देश के शीर्ष संवैधानिक पदों—राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, केंद्रीय मंत्रियों, राज्यों के मुख्यमंत्रियों, सांसदों, विधायकों सहित न्यायपालिका और कार्यपालिका के वरिष्ठ अधिकारियों के वाहनों को देश के सभी टोल प्लाजा पर शत-प्रतिशत छूट (Exemption) प्रदान की गई है।

सिद्धांततः इस विशेषाधिकार का आधार यह है कि ये सभी अधिकारी और जनप्रतिनिधि राष्ट्र निर्माण और व्यवस्था संचालन के लिए निर्बाध रूप से यात्रा कर सकें। किंतु, इसी लोकतांत्रिक व्यवस्था को पारदर्शी, सजग और जवाबदेह बनाए रखने वाले ‘चौथे स्तंभ’ यानी मीडिया को इस नियम पुस्तिका से पूरी तरह बाहर रखा गया है। यह स्थिति न केवल नीतिगत शून्यता को दर्शाती है, बल्कि व्यवस्था के भीतर अधिकारों की असमानता पर भी एक गंभीर सैद्धांतिक प्रश्नचिह्न खड़ा करती है।

समान उत्तरदायित्व, फिर अधिकारों में यह भेद क्यों?

लोकतंत्र के अन्य तीन स्तंभों—विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका—की भांति ही मीडिया का कार्यक्षेत्र भी अत्यंत संवेदनशील और राष्ट्रहित से जुड़ा हुआ है।

  • समान संकट, समान उपस्थिति: देश में किसी भी प्रकार की आपदा, कानून-व्यवस्था का संकट या आपातकालीन स्थिति उत्पन्न होने पर, प्रशासनिक अधिकारियों के साथ-साथ मीडिया कर्मी भी उसी तत्परता और निरंतरता के साथ ग्राउंड जीरो पर तैनात रहते हैं।
  • सजग प्रहरी की भूमिका: सरकारी योजनाओं की जमीनी हकीकत की समीक्षा और प्रशासनिक पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए मीडिया संस्थान और उनके प्रतिनिधि निरंतर राष्ट्रीय और राजकीय राजमार्गों पर सक्रिय रहते हैं।

जब उत्तरदायित्व और संकट के समय मीडिया की भूमिका कार्यपालिका के समतुल्य है, तो फिर राष्ट्रीय स्तर पर मिलने वाली सुविधाओं और सम्मान के दायरे से इस चौथे स्तंभ को दूर रखना न्यायसंगत प्रतीत नहीं होता।

सिद्धांत और व्यावहारिकता में समन्वय की आवश्यकता

इस विषय पर उठ रहे सवाल किसी व्यवस्था के विरोध में नहीं, बल्कि व्यवस्था के भीतर समानता और न्याय की स्थापना के पक्ष में हैं। राजनीतिक गलियारों और सार्वजनिक मंचों से अक्सर मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहकर संबोधित किया जाता है, किंतु जब नीतिगत स्तर पर इस दर्जे को व्यावहारिक रूप देने की बात आती है, तो एक स्पष्ट दूरी दिखाई देती है।

नीतिगत सुधार हेतु प्रमुख बिंदु:

  1. व्यावहारिक दर्जे की बहाली: मीडिया को केवल विमर्श में चौथा स्तंभ मानने के बजाय राष्ट्रीय नीतियों और नियमों में भी उसी गरिमा के अनुरूप स्थान दिया जाना अनिवार्य है।
  2. समान टोल नीति का निर्धारण: जिस प्रकार जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों को उनके आधिकारिक पहचान पत्र (ID) या विशिष्ट पास के आधार पर देश भर के टोल प्लाजा पर निर्बाध मार्ग की सुविधा मिलती है, उसी प्रकार मान्यता प्राप्त और सक्रिय मीडिया संस्थानों के वाहनों को भी राष्ट्रीय व राजकीय राजमार्गों पर पूर्णतः टोल मुक्त घोषित किया जाना चाहिए।

एकजुटता की मांग करता ‘सिद्धांत’

वर्तमान परिदृश्य में, यह मांग किसी वर्ग विशेष की सुविधा की नहीं, अपितु पत्रकारिता की अस्मिता, उसके संवैधानिक गौरव और कार्य की स्वतंत्रता से जुड़ी है। क्षेत्रीय मीडिया और स्वतंत्र समाचार पोर्टल्स के लिए यह विषय अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि वे ही सबसे अधिक जमीनी स्तर पर जाकर रिपोर्टिंग करते हैं। इस नीतिगत विसंगति को दूर करने के लिए पूरे मीडिया जगत को एक स्वर में वैचारिक और नीतिगत स्तर पर प्रयास करने होंगे, ताकि लोकतंत्र के इस महत्वपूर्ण स्तंभ को उसका वास्तविक और व्यावहारिक अधिकार प्राप्त हो सके।

देश भर के मीडिया जगत से अपील:

यह किसी एक पत्रकार या एक पोर्टल की निजी मांग नहीं है। यह पूरे पत्रकारिता जगत के अस्तित्व, सम्मान और समानता की लड़ाई है। बड़े मीडिया घराने सरकारी विज्ञापनों और फंड के गणित में उलझे रहकर शायद इस बुनियादी हक पर मौन रहें, लेकिन देश के हर स्वतंत्र पत्रकार और क्षेत्रीय मीडिया हाउस को इस सिद्धांत के लिए एक सुर में आवाज उठानी होगी।

यदि हमारा काम देश की सेवा है, तो हमारे रास्ते में यह टोल का बैरियर क्यों? इस आवाज़ को इतनी मजबूती से उठाइए कि यह दिल्ली के नीति निर्माताओं के कानों तक पहुंचे।

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