प्रशासनिक नाकामी: गड्ढा भरने के बजाय प्रशासन ने खड़ा किया संकेतक, पिछले ३ दिनों से स्कूल के बच्चों और राहगीरों की जान से हो रहा है खिलवाड़।
विशेष खोजी ब्यूरो, मुंबई (वशिष्ठ वाणी):
हर साल मानसून के आते ही महानगरपालिका और सरकार द्वारा मुंबई के ‘शहरी विकास’ और सड़कों के जीर्णोद्धार को लेकर करोड़ों-अरबों रुपये पानी की तरह बहाने के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं। लेकिन प्रकृति की पहली भारी बारिश ही इन तमाम कागजी दावों और तथाकथित विकास की पोल खोलकर रख देती है। ‘वशिष्ठ वाणी’ की टीम ने आज मुंबई की सड़कों पर उतरकर एक ऐसा ही हैरान करने वाला ज़मीनी सच उजागर किया है, जो यह साबित करने के लिए काफी है कि आम मुंबईकरों की सुरक्षा स्थानीय प्रशासन के लिए कितनी मायने रखती है।
बिलीबोंग स्कूल के पास ३ दिन से तमाशा: गड्ढा ठीक करने के बजाय खड़ा किया ‘अवरोधक’
‘वशिष्ठ वाणी’ की टीम पिछले ३ दिनों से जनकल्याण नगर स्थित बिलीबोंग हाई इंटरनेशनल स्कूल के पास की मुख्य सड़क के बीचों-बीच हुए एक बेहद गहरे और जानलेवा गड्ढे की निगरानी कर रही थी। चूंकि यह एक प्रमुख स्कूल और रिहायशी इलाका है, इसलिए यहाँ नियमतः प्रशासन को युद्धस्तर पर काम करके इस गड्ढे को तुरंत कंक्रीट या कोल्ड-मिक्स से भरकर सड़क को समतल करना चाहिए था। लेकिन तंत्र ने अपनी जिम्मेदारी निभाने के बजाय एक अजीबोगरीब ‘जुगाड़’ ढूंढ निकाला।
तस्वीरों में साफ देखा जा सकता है कि गड्ढे को भरने के बजाय वहां सिर्फ एक कामचलाऊ सांकेतिक अवरोधक (बैरिकेड/इंडिकेटर) खड़ा करके अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया गया है, ताकि जनता को पता चले कि यहाँ गड्ढा है! ‘वशिष्ठ वाणी’ आज आला अधिकारियों से सीधे तौर पर पूछती है—क्या आपका काम सिर्फ खतरों की निशानदेही करना है या उन खतरों को खत्म करना है? यह सड़क को सुरक्षित बनाना है या किसी बड़ी दुर्घटना को आमंत्रण देना है?
समय रहते क्यों नहीं सुधरा सिस्टम? प्रशासन आखिर किस चीज का कर रही है इंतजार?
सवाल यह उठता है कि मानसून की तैयारियों के नाम पर जो महीनों पहले बैठकें होती हैं और बजट पास किए जाते हैं, वे आखिर जाते कहाँ हैं? समय रहते इन सड़कों का सही निर्माण क्यों नहीं किया गया? और जब ३ दिन पहले यह जानलेवा गड्ढा हो चुका था, तो जिम्मेदार इंजीनियर और ठेकेदार किस शुभ मुहूर्त का इंतजार कर रहे हैं?
मुंबई में इस समय लगातार मूसलाधार बारिश हो रही है। ऐसे में सड़कों पर पानी भरना और दृश्यता (Visibility) कम होना आम बात है। यह सड़क स्कूल के पास की है, जहां से सैकड़ों बच्चे और उनके अभिभावक रोज़ गुजरते हैं। रात के अंधेरे में या पानी भरे होने की स्थिति में अगर कोई दुपहिया वाहन चालक, मासूम बच्चा या राहगीर इस गड्ढे और खड़े किए गए इस ‘तमाशे’ से टकरा जाता है, तो उसकी जान पर बन आना तय है।
अगर कोई अनहोनी हुई, तो जवाबदेही किसकी होगी?
अफ़सरों के इस ढीले रवैये को देखकर ऐसा लगता है कि समूची व्यवस्था को उन्होंने अपनी बपौती समझ लिया है। उन्हें किसी की जान की कोई परवाह नहीं है। ‘वशिष्ठ वाणी’ आज सार्वजनिक रूप से यह सवाल उठाती है कि यदि इस गड्ढे के कारण कोई अप्रिय घटना या बड़ा हादसा होता है, तो उसकी कानूनी जवाबदेही कौन लेगा? क्या वह लापरवाह वॉर्ड ऑफिसर लेगा, या वह ठेकेदार लेगा जिसने घटिया सड़क बनाई, या फिर वह शीर्ष नेतृत्व लेगा जो केवल बड़ी-बड़ी बातें करना जानता है?
हादसा हो जाने के बाद सिर्फ मुआवजे का मरहम लगाना और जांच कमेटियों का नाटक रचना सिस्टम की पुरानी आदत बन चुकी है। लेकिन जनता अब इस खोखले तंत्र को और बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है। ‘वशिष्ठ वाणी’ प्रशासन को अल्टीमेटम देती है कि जनकल्याण नगर, बिलीबोंग स्कूल के पास के इस जानलेवा गड्ढे को तत्काल प्रभाव से भरकर सड़क को दुरुस्त किया जाए, अन्यथा जनता के स्वाभिमान और सुरक्षा की इस लड़ाई को हम कोर्ट और लोकायुक्त तक लेकर जाएंगे।
डिस्क्लेमर (Disclaimer): यह रिपोर्ट मुंबई की जनता की सुरक्षा और सार्वजनिक जवाबदेही तय करने के उद्देश्य से की गई एक निष्पक्ष जमीनी पड़ताल है। ‘वशिष्ठ वाणी’ का उद्देश्य किसी प्रशासनिक संस्था की छवि धूमिल करना नहीं, बल्कि नागरिक अधिकारों की रक्षा करना है।












