देश में इन दिनों एक ‘उत्सव’ का माहौल है। चर्चा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहने के नेहरू के रिकॉर्ड को पीछे छोड़ दिया है। सत्ता के गलियारों में इसे एक ऐतिहासिक उपलब्धि के रूप में प्रचारित किया जा रहा है, मानो पद पर बने रहना ही सुशासन का एकमात्र पैमाना हो। लेकिन, इस उत्सव के शोर में एक सवाल है जो गुम हो गया है—क्या कार्यकाल की अवधि विकास की गारंटी है? ‘वशिष्ठ वाणी’ आज इसी मौन को तोड़ने का संकल्प लेती है।

• लेख: अभिषेक अनिल वशिष्ठ •
(वशिष्ठ मीडिया हाउस प्राइवेट लिमिटेड के चेयरमैन एवं समूह दैनिक समाचार पत्र के स्वामी/प्रकाशक)
1. उत्सव का शोर और अधूरे वादों की खामोशी
आज मीडिया का एक बड़ा वर्ग सत्ता के यशोगान में व्यस्त है। किसी ने भी यह पूछने की जहमत नहीं उठाई कि जिन वादों की बुनियाद पर जनता ने बहुमत दिया था, उनका क्या हुआ? क्या वे वादे महज चुनावी ‘जुमला’ थे जो सत्ता मिलते ही इतिहास के पन्नों में दफन हो गए? जनता पूछ रही है—प्रधानमंत्री जी, क्या पद पर बैठने के बाद आपकी सोच में बदलाव आया है या फिर वादे करने का दौर ही समाप्त हो गया है?
2. विकास का ‘विपक्ष’ और लोकतंत्र की चिंताएं
जिस विकास का सपना दिखाकर ‘अच्छे दिन’ का वादा किया गया था, आज धरातल पर उसकी तस्वीर क्या है? आज न केवल मीडिया का एक बड़ा हिस्सा सत्ता के दबाव में अपनी धार खो चुका है, बल्कि विपक्ष का एक धड़ा भी अपनी विचारधारा को त्यागकर भाजपा के साथ जुड़ने की होड़ में है। क्या यही वह ‘नया भारत’ है जिसकी कल्पना की गई थी? जहाँ असहमतियों को कुचल दिया जाए, जहाँ विपक्ष का अस्तित्व समाप्त हो जाए और जहाँ केवल सत्ता की जय-जयकार सुनाई दे?
3. ‘वशिष्ठ वाणी’ के सीधे सवाल: जनता का हक, हमारा फर्ज
हम केवल प्रशंसा के पुल नहीं बांधते, हम आईना दिखाते हैं। ‘वशिष्ठ वाणी’ प्रधानमंत्री से सीधे सवाल करती है:
- आपने प्रधानमंत्री बनने के बाद अपने उन वादों में से कितने पूरे किए जो आपने घोषणापत्र में किए थे?
- क्या ‘अच्छे दिन’ का वादा अब केवल एक जुमला बनकर रह जाएगा?
- आप और आपका तंत्र सच के सवालों से इतना घबराते क्यों हैं?
4. क्या ‘जुमले’ ही अब चुनाव का आधार हैं?
आज चुनाव के दौरान भी ‘विकास’ और ‘अच्छे दिन’ जैसे शब्दों की चर्चा कम हो गई है, क्योंकि शायद सत्ता को पता है कि सवाल पूछने वाली मीडिया अब अस्तित्व में नहीं है और संवैधानिक संस्थाएं भी एक विशेष विचारधारा की ओर झुकी हुई हैं। लेकिन ‘वशिष्ठ वाणी’ चुप नहीं रहेगी। सत्ता को यह समझना होगा कि रिकॉर्ड बनाना बड़ी बात नहीं है, बड़ी बात यह है कि उस रिकॉर्ड के दौरान आम आदमी की जिंदगी में कितना सकारात्मक बदलाव आया।
निष्ठा का संकल्प
नेहरू के रिकॉर्ड को पीछे छोड़ने का उत्सव मनाने से पहले, यह चिंतन आवश्यक है कि जनता ने आपको ‘पद’ के लिए नहीं, ‘परिवर्तन’ के लिए चुना था। यदि आज का पत्रकार सच पूछने से डरता है, तो याद रखिए—’वशिष्ठ वाणी’ अभी भी जिंदा है। हम सत्ता से तब तक सवाल पूछते रहेंगे जब तक जनता को उसके हक का जवाब नहीं मिल जाता।
प्रधानमंत्री जी, रिकॉर्ड तो आपने बना लिया, अब यह बताइए कि उस रिकॉर्ड में ‘विकास’ कहाँ है?












