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लोकतंत्र के ‘चौथे स्तंभ’ की अनदेखी कब तक? वशिष्ठ वाणी ने उठाई ईमानदार पत्रकारों के लिए अधिकारों की आवाज़

नई दिल्ली / मुंबई: देश में जब भी लोकतंत्र की दुहाई दी जाती है, तो न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका के साथ ‘मीडिया’ को चौथा स्तंभ माना जाता है। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि जनता के लिए अपनी जान जोखिम में डालकर सच दिखाने वाले ईमानदार पत्रकारों को आज सरकार और व्यवस्था की तरफ से वह बुनियादी सुविधाएं भी नहीं मिलतीं, जो पांच साल के लिए चुनकर आने वाले नेताओं को पलक झपकते ही मिल जाती हैं।

‘वशिष्ठ वाणी’ आज देश के सर्वोच्च पदों पर बैठे माननीय राष्ट्रपति और माननीय प्रधानमंत्री से सीधे कुछ तीखे लेकिन जरूरी सवाल कर रहा है, जो सीधे तौर पर देश के चौथे स्तंभ के अस्तित्व और उसकी सुरक्षा से जुड़े हैं।

नेताओं को वीआईपी सुविधाएं, तो जान पर खेलने वाले पत्रकारों को क्यों नहीं?

हम यहाँ किसी पेंशन योजना की बात नहीं कर रहे हैं। सवाल उन बुनियादी कार्य-सुविधाओं का है जो एक जनप्रतिनिधि (नेता) को मिलती हैं। नेताओं को आने-जाने के लिए मुफ्त हवाई यात्रा (Flight), ट्रेन (Train) के प्रथम श्रेणी के पास और हाईवे पर ‘फ्री टोल’ (Free Toll) जैसी अनगिनत सुविधाएं दी जाती हैं।

विडंबना देखिए—जनता से वादे कर सत्ता में आने वाले कई नेता कुर्सी पाते ही जनता को भूल जाते हैं, फिर भी उनकी सुख-सुविधाओं में कोई कमी नहीं आती। दूसरी तरफ, एक ईमानदार और निष्पक्ष पत्रकार बिना किसी सरकारी मदद के, अपनी जान पर खेलकर, धूप, बरसात और धमकियों के बीच समाज की बुराइयों और भ्रष्टाचार को उजागर करता है। अगर नेताओं का सफर देश सेवा के नाम पर मुफ्त हो सकता है, तो सच की तलाश में भटकने वाले पत्रकार को टोल नाकों पर कतारों में क्यों खड़ा होना पड़ता है? उन्हें सफर की बुनियादी सुविधाएं क्यों नहीं दी जातीं?

‘कॉर्पोरेट मीडिया’ बनाम ‘जमीनी पत्रकार’ का फर्क समझे सरकार

आज देश में मीडिया के दो रूप साफ नजर आते हैं। एक तरफ वह ‘गोदी मीडिया’ या बड़े कॉर्पोरेट घराने हैं, जिन्हें सरकारी विज्ञापनों का इतना मोटा फंड मिलता है कि उनके पास अपने प्राइवेट जेट तक मौजूद हैं। उन्हें किसी सुविधा की दरकार नहीं है।

लेकिन ‘वशिष्ठ वाणी’ आज उन छोटे, स्वतंत्र और क्षेत्रीय मीडिया घरानों की आवाज उठा रहा है जो पूरी ईमानदारी और निष्ठा से अपने कर्तव्यों का पालन कर रहे हैं। ये वो पत्रकार हैं जो बिना किसी लालच के, सरकारी तंत्र और स्थानीय माफियाओं की आंख में आंख डालकर सच लिखते हैं। लेकिन बदले में इन्हें क्या मिलता है? मंत्रियों द्वारा झूठी जांच का डर और अधिकारियों की उदासीनता।

‘वशिष्ठ वाणी’ की मांग: खबरों पर हो सीधे एक्शन, वरना अधिकारी हों सस्पेंड!

आज प्रशासनिक अधिकारियों के मन से मीडिया का डर पूरी तरह खत्म हो चुका है। पत्रकार अपनी जान जोखिम में डालकर अवैध निर्माण, भ्रष्टाचार या जनविरोधी नीतियों पर खबर प्रकाशित करता है, लेकिन अधिकारी उस पर फाइलों का अंबार लगाकर बैठ जाते हैं। नेताओं के इशारे पर पत्रकारों को ही झूठी जांचों में उलझा दिया जाता है।

हमारी माननीय राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री जी से मांग है कि देश में एक ऐसा सख्त कानून बने जिसके तहत:

  • अनिवार्य कार्रवाई (Mandatory Action): यदि किसी मान्यता प्राप्त या पंजीकृत न्यूज़ मीडिया में जनहित या भ्रष्टाचार से जुड़ा कोई विषय (News) प्रमाणों के साथ प्रकाशित किया जाता है, तो संबंधित विभाग के अधिकारियों के लिए तय समय सीमा के भीतर उस पर कार्रवाई करना अनिवार्य हो।
  • सस्पेंशन का प्रावधान (Suspension Clause): यदि अधिकारी मीडिया में आई गंभीर खबरों को नजरअंदाज करते हैं या भ्रष्टाचार को संरक्षण देते हैं, तो उन्हें तत्काल प्रभाव से निलंबित (Suspend) करने का कानूनी प्रावधान किया जाए।

समय आ गया है बदलाव का

अगर लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को सच में बचाना है, तो कागजी तारीफों से काम नहीं चलेगा। जब तक ईमानदार पत्रकारों को यात्रा में टोल-फ्री और आवागमन की सुविधाएं नहीं मिलेंगी और जब तक उनकी खबरों पर अधिकारियों की जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक लोकतंत्र का यह स्तंभ कमजोर होता रहेगा।

‘वशिष्ठ वाणी’ इस मुहिम को देश के सर्वोच्च पटल तक ले जाने के लिए प्रतिबद्ध है।

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