नई दिल्ली / मुंबई: क्या देश का प्रशासनिक तंत्र मंत्रियों की अकर्मण्यता (काम न करने की आदत) का बंधक बन चुका है? यह एक ऐसा तीखा सवाल है जो आज हर जागरूक नागरिक पूछ रहा है। जब रक्षक ही मूकदर्शक बन जाएं, तो भक्षकों के हौसले बुलंद होना लाजिमी है। आज मंत्रियों की ढीली कार्यशैली को देखकर सरकारी अधिकारियों ने अपनी मनमानी को ही ‘संविधान’ मान लिया है।
इस दमघोंटू व्यवस्था को जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए ‘वशिष्ठ वाणी’ सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के सामने एक ऐसा कानूनी खाका पेश कर रहा है, जिसे नजरअंदाज करना अब सरकार के लिए नामुमकिन होगा। देश को अब प्रशासनिक ‘इलाज’ की नहीं, बल्कि ‘सर्जरी’ की जरूरत है!
💥 मंत्रियों का संरक्षण और अधिकारियों की तानाशाही
जमीनी हकीकत गवाह है कि जब भी किसी बड़े भ्रष्टाचार या अवैध काम को उजागर किया जाता है, तो अधिकारियों के चेहरे पर शिकन तक नहीं आती। वजह साफ है—उन्हें पता है कि जब तक विभागीय मंत्रियों का आशीर्वाद उनके सिर पर है, उनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। मंत्री खुद फाइलों को दबाकर बैठे रहते हैं और उन्हीं के नक्शेकदम पर चलते हुए अधिकारी जनता की शिकायतों को कूड़ेदान में डाल देते हैं। मंत्रियों और अफसरों का यह ‘नेक्सस’ (गठजोड़) जनता के सब्र का इम्तिहान ले रहा है।
⚡ पीएम मोदी जी, ‘वशिष्ठ वाणी’ का यह प्रस्ताव कानून बनने पर मजबूर कर देगा:
प्रधानमंत्री जी, आपकी ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति को धरातल पर उतारने के लिए इस सख्त कानून का आना अब अनिवार्य हो चुका है:
- ‘प्रमाण मिलते ही एक्शन’ का २ दिवसीय अल्टीमेटम: अगर मीडिया या किसी नागरिक ने पूरे सबूत और प्रमाण (Evidence) के साथ किसी अवैध कार्य या भ्रष्टाचार को उजागर कर दिया है, तो संबंधित अधिकारी के पास सोचने का वक्त नहीं होना चाहिए। २ दिन (४८ घंटे) के भीतर उस पर सीधी और सख्त कार्रवाई शुरू होना अनिवार्य हो।
- तबादला कोई सजा नहीं, सीधे सस्पेंशन (निलंबन) हो: अब तक का नियम क्या है? अधिकारी ने काम नहीं किया तो उसका तबादला कर दिया जाता है। यह सजा है या इनाम? नया कानून ऐसा हो कि अगर २ दिन में कार्रवाई नहीं हुई, तो अधिकारी का ट्रांसफर नहीं, बल्कि सीधे पद से निलंबन (Suspension) किया जाए।
- ‘एक बार में परमानेंट फुलस्टॉप’: आज कार्रवाई होती है, कल फिर वही अवैध धंधा शुरू हो जाता है। यह आंख-मिचौली बंद होनी चाहिए। कानून में प्रावधान हो कि कार्रवाई ऐसी हो जो समस्या को जड़ से खत्म करे। अगर दोबारा वही अवैध कार्य शुरू हुआ, तो सीधे इलाके के प्रशासनिक मुखिया की कुर्सी जाएगी।
🔥 मंत्रियों पर सीधा प्रहार: संरक्षण देना बंद करें!
यह देश का दुर्भाग्य है कि जनता जिन मंत्रियों को अपनी भलाई के लिए चुनती है, वे खुद तो निष्क्रिय हैं ही, साथ ही अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने के लिए ईमानदार कार्रवाई के आड़े आते हैं। अधिकारियों को मंत्रियों की इस सरपरस्ती से आजाद करना होगा और उनके मन में कानून का ऐसा खौफ पैदा करना होगा कि वे किसी भी नेता की सिफारिश सुनने से पहले अपनी कुर्सी जाने के डर से कांप उठें।
‘वशिष्ठ वाणी’ का यह रिकॉर्ड और संकल्प है: हम इस मुद्दे को तब तक उठाते रहेंगे जब तक प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) इस पर संज्ञान लेकर ऐसा कानून बनाने पर मजबूर न हो जाए। अब मंत्रियों की ढाल के पीछे छिपने वाले भ्रष्ट अधिकारियों के दिन गिनती के बचे हैं!













