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कोर्ट भी मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकता”: स्वप्नपूर्ति सोसाइटी के अध्यक्ष बालासाहेब भगत का अहंकार चरम पर, कोर्ट को दी खुली चुनौती!

मालाड (मालवणी): मालवणी की स्वप्नपूर्ति सोसाइटी में सत्ता के नशे में चूर अध्यक्ष बालासाहेब भगत का अहंकार अब चरम पर है। वशिष्ठ मीडिया हाउस के संस्थापक अभिषेक अनिल वशिष्ठ द्वारा कानूनी लड़ाई शुरू करने और प्रशासन से कार्रवाई करवाने के बाद भी भगत की अकड़ कम होने का नाम नहीं ले रही है। हद तो तब हो गई जब एक रूम मालिक के सामने उन्होंने भरे मंच से कोर्ट की गरिमा का अपमान करते हुए कहा— “अभिषेक वशिष्ठ चाहे किसी भी कोर्ट में चले जाएं, मेरा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता!”

अहंकार और हकीकत का अंतर

घटना तब सामने आई जब एक परेशान रूम मालिक ने बालासाहेब भगत को उनकी बढ़ती मनमानी पर टोकते हुए नसीहत दी कि अब उन्हें सुधर जाना चाहिए। दरअसल, अभिषेक वशिष्ठ की पहल के कारण ही:

  • अवैध पार्किंग पर लगाम: सोसाइटी में व्याप्त अराजक पार्किंग पर रोक लगी।
  • बुलडोजर की दस्तक: सामना नगर में अवैध निर्माण के खिलाफ कार्रवाई के लिए बुलडोजर तक पहुँचा।
  • भारी जुर्माना: MHADA द्वारा अवैध निर्माण पर 1 लाख 8 हजार रुपये का तगड़ा जुर्माना लगाया गया।

इन ठोस कानूनी कार्यवाहियों के बावजूद, भगत का जवाब किसी सुधरते हुए व्यक्ति का नहीं, बल्कि एक ऐसे ‘तानाशाह’ का था जो कानून को अपनी जेब में समझता है। उन्होंने रूम मालिक के सामने अपनी कुर्सी और पद का रौब दिखाते हुए कहा कि कोई भी कार्रवाई उन्हें उनके पद से नहीं हटा सकती।

क्या न्यायालय का नहीं है डर?

बालासाहेब भगत का यह बयान कि “कोर्ट भी उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता”, कानून के शासन (Rule of Law) के लिए एक सीधा चैलेंज है। क्या यह मात्र एक जुबानी अहंकार है या फिर इसके पीछे किसी बड़े संरक्षण (Systemic Support) का हाथ है?

वशिष्ठ वाणी ने इस पूरे घटनाक्रम को गंभीरता से लिया है। बालासाहेब भगत का यह अहंकार अब उन्हें बड़ी मुसीबत में डाल सकता है। कानून की चौखट पर जब उनका यह अहंकार टकराएगा, तो यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या न्यायालय की सख्ती के बाद भी वे यही शब्द दोहरा पाते हैं।

अभिषेक अनिल वशिष्ठ ने दो टूक शब्दों में कहा है— “कानून किसी की जागीर नहीं है, और अहंकारी का अंत निश्चित है। यह लड़ाई तब तक जारी रहेगी जब तक सोसाइटी से भ्रष्टाचार का खात्मा नहीं हो जाता।”

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