लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहे जाने वाले मीडिया जगत से आज एक ऐसी कड़वी सच्चाई सामने आ रही है, जिसे मुख्यधारा का गोदी मीडिया पूरी तरह दबा चुका है। देश में इन दिनों एक नया नैरेटिव सेट किया जा रहा है, जहाँ निष्पक्षता की बात तो होती है, लेकिन धरातल पर सच लिखने वाले छोटे और स्वतंत्र समाचार पत्रों का अस्तित्व ही समाप्त करने की कानूनी घेराबंदी चल रही है। सरकार के नए फैसलों और नियमों को देखकर अब यह सवाल उठना लाजिमी हो गया है—क्या इस देश में अब सिर्फ वही मीडिया बचेगा जो सत्ता के इशारों पर नाचेगा? क्या छोटे अखबारों पर ताला लगाने की सुनियोजित तैयारी हो चुकी है?

• लेख: अभिषेक अनिल वशिष्ठ •
(वशिष्ठ मीडिया हाउस प्राइवेट लिमिटेड के चेयरमैन एवं समूह दैनिक समाचार पत्र के स्वामी/प्रकाशक)
RNI से PRGI: नीति में बदलाव या स्वतंत्र आवाज को दबाने की साजिश?
पिछले कुछ समय में सरकार ने जो प्रशासनिक फेरबदल किए हैं, वे छोटे पत्रकारों की कमर तोड़ने वाले हैं। पहले पारदर्शी और स्थापित व्यवस्था के तहत काम कर रही RNI (Registrar of Newspapers for India) की वेबसाइट को बंद करके अब PRGI (Press and Registration of Periodicals) नाम से एक नया पोर्टल शुरू किया गया है।
इस नए सिस्टम के तहत जो नियम थोपे गए हैं, वे किसी भी स्वतंत्र और सीमित संसाधनों वाले पत्रकार के लिए मौत के परवाने जैसे हैं:
- दैनिक प्रिंटिंग और अपलोडिंग की अनिवार्यता: अब हर छोटे अखबार के लिए रोजाना कॉपी प्रिंट करवाना और उसकी डिजिटल कॉपी को प्रतिदिन PRGI की साइट पर अपलोड करना अनिवार्य कर दिया गया है।
- जुर्माने का खौफनाक जाल: पहले जो छोटे पत्रकार या प्रकाशक किसी आर्थिक तंगी या व्यक्तिगत समस्या के कारण समय पर सालाना विवरण (Annual Statement) नहीं भर पाते थे, उन पर मात्र ₹500 का नाममात्र जुर्माना लगता था। लेकिन नए नियमों के तहत इस राशि को सीधे ₹10,000 से बढ़ाकर ₹2,00,000 (दो लाख रुपये) तक कर दिया गया है।
धरातल की हकीकत से कटी सरकार और कॉर्पोरेट जगत का खेल
अब सरकार और नीति निर्माताओं से यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि क्या उन्हें जमीनी हकीकत का थोड़ा भी अंदाजा है? देश के कस्बों, जिलों और छोटे शहरों से निकलने वाले अखबारों के पास कोई बड़ा कॉर्पोरेट इन्वेस्टर नहीं होता।
- एक छोटा पत्रकार विज्ञापन के अभाव में, अपनी जेब से पैसे लगाकर, डीटीपी ऑपरेटर (DTP Operator) का खर्च उठाकर और प्रिंटिंग प्रेस की मनमानी कीमतें झेलकर जैसे-तैसे जनता की आवाज को जिंदा रखता है।
- उनके पास कोई बड़ा फंड नहीं होता कि वे रोज हजारों प्रतियां छपवा सकें या दो लाख रुपये का जुर्माना भर सकें।
ऐसे में यह साफ दिखाई देता है कि यह पूरा खेल बड़े मीडिया घरानों और कॉर्पोरेट जगत को फायदा पहुँचाने के लिए रचा जा रहा है। बड़े मीडिया हाउस चाहते हैं कि छोटे अखबार पूरी तरह बंद हो जाएं, ताकि सरकारी और निजी विज्ञापनों (Advertisements) पर केवल उनका और उनके मालिकों का एकाधिकार रहे। जब छोटे अखबार ही नहीं रहेंगे, तो स्थानीय स्तर पर भ्रष्टाचार की पोल कौन खोलेगा? SRA जैसे महकमों में होने वाले घोटालों पर सवाल कौन उठाएगा?
सत्ता को ‘वशिष्ठ वाणी’ की दो टूक चेतावनी: समय हमेशा एक जैसा नहीं रहता
आज कॉर्पोरेट जगत की एंट्री ने मीडिया में सच छापना और सच बोलना वैसे ही बेहद मुश्किल कर दिया है। उस पर से सरकार के ये नए नियम आग में घी डालने का काम कर रहे हैं। लेकिन सत्ता के सिंहासन पर बैठे लोगों को इतिहास से सीख लेनी चाहिए।
“आज आप सत्ता के शीर्ष पर हैं, तो नियम बदल रहे हैं। लेकिन याद रखिए, समय का चक्र हमेशा घूमता है। आज आप हैं, कल कोई और होगा। अगर आज आपने स्वतंत्र और छोटे अखबारों का गला घोंट दिया, तो कल जब आप विपक्ष में बैठेंगे, तब आपकी आवाज उठाने वाला कोई नहीं बचेगा। तब यही गोदी मीडिया आपके खिलाफ खड़ा होगा, जिसके इशारे पर आज आप ये दमनकारी नीतियां बना रहे हैं।”
हमारा संकल्प: इस दमन के खिलाफ रुकेगी नहीं कलम
सरकार को इन अव्यावहारिक और दमनकारी नियमों को तुरंत बदलना चाहिए। छोटे अखबार इस देश के लोकतंत्र की नसें हैं; अगर इन्हें सुखा दिया गया, तो लोकतंत्र का पूरा ढांचा ढह जाएगा।
‘वशिष्ठ वाणी’ इस दमनकारी नीति की कड़े शब्दों में निंदा करती है। हम देश के हर उस छोटे, स्वतंत्र और ईमानदार पत्रकार के साथ खड़े हैं जो संसाधनों की कमी के बावजूद सच लिखने का साहस रखता है। चाहे नियम कितने भी कड़े कर दिए जाएं, जनता की आवाज को दबाया नहीं जा सकता—क्योंकि जहाँ सच की नीयत साफ होती है, वहाँ हर तानाशाही को झुकना ही पड़ता है!













