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संपादकीय: ‘गिरगिट’ राजनीति और राघव चड्ढा का ‘केसरिया’ मोह

सत्ता की दहलीज पर दम तोड़ते आदर्श

भारतीय राजनीति के रंगमंच पर एक ऐसा दृश्य दिखाई दिया है जिसे ‘अवसरवाद की पराकाष्ठा’ कहा जाए तो गलत नहीं होगा। कल तक जिन राघव चड्ढा की राजनीति भाजपा को “तानाशाह”, “अनपढ़ों की जमात” और “लोकतंत्र का हत्यारा” बताने से शुरू होती थी, आज वही राघव चड्ढा उसी भाजपा की गोद में बैठकर ‘राष्ट्र निर्माण’ का पाठ पढ़ रहे हैं। यह सिर्फ एक नेता का दल बदलना नहीं है, बल्कि उन करोड़ों मतदाताओं के भरोसे का कत्ल है जिन्होंने ‘बदलाव’ की राजनीति के नाम पर एक नई पार्टी को चुना था।

सिद्धांतों का ‘शीशमहल’ और एजेंसियों का खौफ

राघव चड्ढा का तर्क है कि आम आदमी पार्टी अपने रास्तों से भटक गई है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह भटकाव उन्हें तब नजर नहीं आया जब वे राज्यसभा की मखमली कुर्सियों पर बैठकर सरकार का बचाव कर रहे थे? सच तो यह है कि जब जांच एजेंसियों (ED/CBI) का शिकंजा कसता है, तो बड़े-बड़े ‘क्रांतिकारियों’ के घुटने जवाब दे जाते हैं। जनता पूछ रही है—क्या यह भाजपा की नीतियों के प्रति प्रेम है या जेल जाने का डर?


• लेखअभिषेक अनिल वशिष्ठ •
(वशिष्ठ मीडिया हाउस प्राइवेट लिमिटेड के चेयरमैन एवं समूह दैनिक समाचार पत्र के स्वामी/प्रकाशक)


‘वॉशिंग मशीन’ की जादुई सफाई

राजनीति में अब यह एक ‘स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर’ (SOP) बन चुका है: पहले विपक्ष में रहकर गला फाड़कर चिल्लाओ, फिर भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरो, और अंत में भाजपा की ‘वॉशिंग मशीन’ में नहाकर एकदम बेदाग होकर बाहर निकलो। राघव चड्ढा और उनके साथ गए 6 अन्य सांसदों ने दो-तिहाई का जो गणित बैठाया है, वह उनकी नैतिकता नहीं बल्कि उनकी राज्यसभा की सीट बचाने की छटपटाहट को दर्शाता है।

जनता की अदालत में क्या जवाब देंगे?

सोशल मीडिया पर राघव चड्ढा को मिल रहा ‘Gen-Z’ का झटका इस बात का सबूत है कि आज की पीढ़ी को बेवकूफ बनाना आसान नहीं है। महज़ 24 घंटों में लाखों फॉलोअर्स खो देना यह बताता है कि लोग उनके इस ‘यू-टर्न’ को पचा नहीं पा रहे हैं।

बड़ी बात: “अगर नेता केवल अपनी सुरक्षा और सत्ता के लिए निष्ठा बदलते रहेंगे, तो लोकतंत्र में ‘विपक्ष’ नाम की संस्था सिर्फ एक मज़ाक बनकर रह जाएगी।”

निष्कर्ष

राघव चड्ढा अब भाजपा के सिपाही हैं। वे अब उसी “तानाशाही” के गुण गाएंगे जिसके खिलाफ उन्होंने राजनीति शुरू की थी। लेकिन इतिहास उन्हें एक ऐसे नेता के रूप में याद रखेगा जिसने मुश्किल समय में मैदान छोड़ना बेहतर समझा। यह राजनीति के गिरते स्तर का वह दौर है जहाँ ‘मिशन’ अब ‘कमीशन’ और ‘सुरक्षा’ में तब्दील हो चुका है।

राजनीति शायद इसी का नाम है, जहाँ सुबह की ‘गाली’ शाम को ‘आरती’ में बदल जाती है।

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