मुंबई: मरीन ड्राइव के प्रोमनेड की गंदगी तो सिर्फ झांकी है, असली भयावह मंजर तो अरब सागर की उन लहरों में दिखता है, जो अपने साथ टनों प्लास्टिक, कचरा और बोतलें समेटे हुए हैं। ‘वशिष्ठ वाणी’ की टीम ने जब समुद्र के भीतर तैरती इस गंदगी को देखा, तो प्रशासन के दावों की कलई पूरी तरह खुल गई। लेकिन यहाँ सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि—क्या स्वतंत्र पत्रकारिता और जनहित की खबरों की कीमत अब सिर्फ रद्दी के भाव रह गई है?
प्रशासन की मर्जी: ‘जब मन होगा, तब जागेंगे’
आज की कड़वी सच्चाई यह है कि आप चाहे जितनी भी खोजी खबरें प्रकाशित कर लें, सबूतों के साथ प्रशासनिक लापरवाही को उजागर कर दें, लेकिन जब तक ‘सिस्टम’ का अपना मन नहीं होगा, तब तक एक पत्ता भी नहीं हिलता। ऐसा प्रतीत होता है कि बीएमसी (BMC) और संबंधित विभागों के आला अधिकारियों ने अपनी संवेदनशीलता बेच खाई है।
अखबार और मीडिया जनहित के मुद्दों को पूरी ईमानदारी से पन्नों पर उतारते हैं, लेकिन एयर-कंडीशनर कमरों में बैठे साहबों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। यह स्थिति लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हम सिर्फ दीवार में अपना सिर पीट रहे हैं?

• लेख: अभिषेक अनिल वशिष्ठ •
(वशिष्ठ मीडिया हाउस प्राइवेट लिमिटेड के चेयरमैन एवं समूह दैनिक समाचार पत्र के स्वामी/प्रकाशक)
जनता की कचरा चेतना और सिस्टम का ढीठ रवैया
- समस्या की गहराई: मरीन ड्राइव पर आने वाले लोग समुद्र को डस्टबिन समझकर उसमें प्लास्टिक की बोतलें और थर्माकोल फेंक देते हैं। लहरें जब इस कचरे को वापस किनारे पर फेंकती हैं, तो यह पूरी मुंबई की बदनामी का कारण बनता है।
- दिखावे की कार्रवाई: न्यूज़ पब्लिश होने के बाद प्रशासन का रवैया हमेशा ‘टेंपररी’ होता है। दो दिन की दिखावे की सफाई होगी, एकाध गरीब फेरीवाले पर डंडा चलेगा, और फिर सब कुछ पुराने ढर्रे पर लौट आएगा। स्थायी समाधान (जैसे भारी जुर्माना और कड़ा पहरा) लागू करने की इच्छाशक्ति सिस्टम में दिखती ही नहीं।
वशिष्ठ वाणी का संकल्प: हम लिखना बंद नहीं करेंगे!
भले ही आज सिस्टम बहरा और गूंगा बनकर बैठा हो, भले ही अधिकारियों को कोई फर्क न पड़ रहा हो, लेकिन ‘वशिष्ठ वाणी’ जनता और प्रकृति की इस आवाज को दबने नहीं देगी। अगर प्रशासन को लगता है कि उनके न जागने से पत्रकारिता थम जाएगी, तो यह उनकी भूल है। हम दीवार में सिर पीटना जारी रखेंगे, जब तक कि वह दीवार दरक नहीं जाती और सिस्टम को जवाब देने के लिए मजबूर नहीं होना पड़ता।













