लेख: अनिल कुमार मिश्रा
भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसकी विविधता में निहित एकता रही है। लेकिन आज प्रश्न यह है कि क्या हम वास्तव में उस एकता को सहेज पा रहे हैं, जिसने हमें सदियों की चुनौतियों के बावजूद एक राष्ट्र के रूप में जीवित रखा?
इतिहास गवाह है कि आपसी मतभेद, कटुता, द्वेष और बिखराव ने भारत को लंबे समय तक विदेशी शक्तियों का गुलाम बनाए रखा। दुर्भाग्य से आज भी हम अनेक स्तरों पर उसी विभाजनकारी मानसिकता से जूझ रहे हैं। धर्म, जाति, भाषा और राजनीतिक विचारधाराओं के आधार पर बढ़ती दूरियां न केवल सामाजिक ताने-बाने को कमजोर कर रही हैं, बल्कि राष्ट्र की सामूहिक शक्ति को भी क्षीण कर रही हैं।
विश्व के अनेक देश भारत के आसपास या बाद में स्वतंत्र हुए, लेकिन आज कई क्षेत्रों में वे हमसे आगे दिखाई देते हैं। यह तुलना केवल आर्थिक विकास की नहीं, बल्कि सुशासन, नागरिक उत्तरदायित्व और राष्ट्रीय प्राथमिकताओं की भी है। कभी “सोने की चिड़िया” कहलाने वाला भारत अपार संभावनाओं का देश है, किंतु उन संभावनाओं को वास्तविकता में बदलने के लिए केवल संसाधन नहीं, बल्कि सही सोच और सामूहिक संकल्प की आवश्यकता है।
किसी भी परिवार की दिशा उसके मुखिया की क्षमता और दृष्टि पर निर्भर करती है। यही सिद्धांत राष्ट्र पर भी लागू होता है। किंतु केवल नेतृत्व को दोष देकर नागरिक अपने दायित्वों से मुक्त नहीं हो सकते। लोकतंत्र में जनता ही सर्वोच्च शक्ति है। यदि नागरिक अपने विवेक का उपयोग छोड़कर केवल राजनीतिक स्वार्थों के आधार पर निर्णय लेने लगें, तो अंततः नुकसान राष्ट्र का ही होता है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम नेताओं के व्यक्तित्व और कार्यों का मूल्यांकन केवल एक पक्ष देखकर न करें। लोकतंत्र में प्रश्न पूछना, जवाबदेही तय करना और राष्ट्रहित को दलगत हितों से ऊपर रखना प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है। दुर्भाग्यवश कई बार हम वही देखने लगते हैं जो हमें दिखाया जाता है, जबकि वास्तविकता का दूसरा पक्ष अनदेखा रह जाता है।
स्वतंत्रता के 75 वर्षों बाद भी यदि भ्रष्टाचार, असमानता, सामाजिक विभाजन और राजनीतिक स्वार्थ हमारे विकास में बाधक बने हुए हैं, तो इसके लिए सामूहिक आत्ममंथन आवश्यक है। राष्ट्र का भविष्य केवल सरकारें नहीं बनातीं, बल्कि जागरूक और जिम्मेदार नागरिक भी बनाते हैं।
समय की मांग है कि हम मतभेदों को शत्रुता में बदलने के बजाय संवाद का माध्यम बनाएं। राष्ट्र धर्म, संस्कृति, संस्कार और सामाजिक समरसता को केंद्र में रखकर आगे बढ़ें। व्यक्तिगत और राजनीतिक स्वार्थों से ऊपर उठकर यदि हम राष्ट्रीय हित को सर्वोपरि मान लें, तो भारत पुनः विश्व में अपनी गौरवशाली पहचान स्थापित कर सकता है।
आज भी देर नहीं हुई है। आवश्यकता केवल जागरूकता, एकजुटता और सही दिशा में सामूहिक प्रयास की है। क्योंकि सच यही है—
“जब जागो तभी सवेरा।”
वंदे मातरम्।













