
लेख: अभिषेक अनिल वशिष्ठ • (वशिष्ठ मीडिया हाउस प्राइवेट लिमिटेड के चेयरमैन एवं समूह दैनिक समाचार पत्र के स्वामी/प्रकाशक)
जब किसी राज्य में कानून-व्यवस्था की साख का सवाल उठता है, तो अक्सर बातें नीतियों, बजट और पुलिस थानों के आधुनिकीकरण की होती हैं। लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त काग़ज़ों से बहुत अलग होती है। आज जब हम मुंबई के मालवणी पुलिस स्टेशन की कार्यप्रणाली को देखते हैं, तो एक ही यक्ष प्रश्न कौंधता है— क्या हमारी पुलिस व्यवस्था अब न्याय की रक्षक नहीं, बल्कि समझौतों की दलाल बनकर रह गई है?
यह सवाल केवल एक पुलिस स्टेशन या कुछ अफ़सरों का नहीं है; यह सवाल उस पूरी सोच का है जो धीरे-धीरे हमारे प्रशासनिक तंत्र को निगल रही है।
जब धाराओं की ताकत ‘टेक्निकल’ बहानेबाज़ी में बदल जाए
भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 118(1) कोई सामान्य धारा नहीं है। जब किसी असहाय महिला या व्यक्ति को बर्बरता से पीटा जाता है और उस पर जानलेवा हमला होता है, तब कानून ने पुलिस को शक्ति दी है कि वह अभियुक्त को तुरंत हिरासत में ले। यह शक्ति पीड़ित को सुरक्षा का अहसास कराने के लिए दी गई है। लेकिन जब मालवणी पुलिस चौकी के दफ़्तर से यह आवाज़ आती है कि “हम टेक्निकल सोचेंगे, अभी गिरफ्तारी नहीं कर सकते”, तो समझ आता है कि ‘टेक्निकल’ शब्द दरअसल अपनी ज़िम्मेदारी से भागने और अपराधियों को संरक्षण देने का एक आधुनिक मुहावरा बन चुका है।
सोचने वाली बात यह है कि आखिर पुलिस प्रशासन के भीतर यह हिम्मत आती कहाँ से है? क्यों एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के पास जब लहूलुहान पीड़िता पहुँचती है, तो उसे सांत्वना और त्वरित न्याय का भरोसा देने के बजाय क्रॉस-केस का डर दिखाया जाता है? क्या कानून अब पीड़ितों को डराने का औजार बन गया है?
पुलिस चौकी की चौखट और ‘बिचौलियों’ का साम्राज्य
इससे भी ज़्यादा चिंताजनक और शर्मनाक पहलू वह है जहाँ न्याय की वेदी को ‘डील’ की मेज़ में तब्दील कर दिया जाता है। जब घटनास्थल पर मौजूद प्रत्यक्षदर्शी गवाही देते हैं, जब चीख-चीखकर लोग बताते हैं कि हमलावर दबंग और आदतन अपराधी हैं, तब पुलिस का काम मामला दर्ज कर कार्रवाई करना होता है। लेकिन हो क्या रहा है? गवाहों के बयानों को रद्दी की टोकरी में डालकर पुलिस चौकी के भीतर एक अनजान बिचौलिए की एंट्री कराई जाती है।
वह बिचौलिया खुलेआम पुलिस के साये में बैठकर पीड़ित से कहता है कि “30 हजार तुम्हारा खर्चा होगा, 30 हजार मेरा… मामला रफा-दफा करो।”
यह दृश्य किसी भी सभ्य समाज के लिए भयावह है। क्या पुलिस चौकियों का इस्तेमाल अब इंसाफ की जगह ‘डील’ पक्की करने के लिए होने लगा है? अगर पुलिस स्टेशन के अंदर बैठे अधिकारियों को इस बात का डर नहीं है कि किसी पीड़ित पर फैसले का दबाव बनाना अपराध है, तो इसका सीधा मतलब है कि उन्हें ऊपर से अभयदान मिला हुआ है।
वर्दी का रौब, नाम छिपाने की साज़िश और चुप्पी का खेल
व्यवस्था की इस सड़न की जड़ें और गहरी हैं। जब बिना वर्दी के, बिना नेम-प्लेट के अधिकारी सिविल ड्रेस में घूमकर जनता पर धौंस जमाते हैं, और जब एक हवलदार अपने वरिष्ठ का नाम तक बताने से इनकार कर देता है—तब यह साबित होता है कि ‘खाकी’ के भीतर जवाबदेही नाम की चीज़ खत्म हो चुकी है। 17-18 अक्टूबर की उस घटना पर वरिष्ठ अधिकारियों का यह कह देना कि “उन्हें मेरे पास भेजो, मैं देख लेती हूँ”, केवल मामले को टालने का एक घिसा-पिटा तरीका था। हफ़्तों बीत जाने के बाद भी कोई कार्रवाई न होना इस बात की पुष्टि करता है कि अंदर ही अंदर सब एक-दूसरे के कारनामों को ढकने की साज़िश में शामिल हैं।
सत्ता के गलियारों से उठती खामोशी
अब सबसे बड़ा सवाल राज्य के नेतृत्व से है। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री और गृह मंत्री देवेंद्र फडणवीस जब कानून का राज कायम करने का दावा करते हैं, तो उन्हें यह समझना होगा कि कानून का राज केवल बड़े-बड़े बयानों से कायम नहीं होता। वह तब कायम होता है जब मालवणी जैसी पुलिस चौकी में न्याय की आस में खड़ी महिला को यह भरोसा हो कि उसकी एफआईआर पर बिना किसी बिचौलिए के निष्पक्ष कार्रवाई होगी।
अफसर बदलते हैं, कमिश्नर बदलते हैं, सरकारें बदलती हैं—लेकिन मालवणी पुलिस चौकी में पीड़ितों को टहलाने, डराने और अपराधियों को बचाने का यह ढर्रा क्यों नहीं बदलता? क्या गृह मंत्रालय ने पुलिस को मनमानी की खुली छूट दे दी है? या फिर प्रशासन इतना लाचार हो चुका है कि उसे थानों के भीतर चल रहे इस खेल की खबर ही नहीं है?
यदि समय रहते ऐसे भ्रष्ट और संवेदनहीन तंत्र पर प्रशासनिक बुलडोज़र नहीं चलाया गया, यदि सवाल पूछने पर मौन धारण करने वाले अधिकारियों और पुलिस चौकियों में ठेकेदारी चलाने वाले बिचौलियों पर सस्पेंशन की गाज़ नहीं गिरी—तो आम जनता का ‘खाकी’ और ‘कानून’ दोनों पर से भरोसा पूरी तरह उठ जाएगा। लोकतंत्र में जब पुलिस रक्षक के बजाय भक्षक जैसा रवैया अपनाने लगे, तो फिर जनता कहाँ जाए? गृह मंत्री और पुलिस कमिश्नर को इस पर महज़ रिपोर्ट मँगवाने का नाटक बंद करके कठोर नज़ीर पेश करनी होगी।


















