
लेख: अभिषेक अनिल वशिष्ठ • (वशिष्ठ मीडिया हाउस प्राइवेट लिमिटेड के चेयरमैन एवं समूह दैनिक समाचार पत्र के स्वामी/प्रकाशक)
लोकतंत्र में जब कोई नागरिक किसी अपराध का शिकार होता है, तो उसकी नज़रें न्याय के लिए किसी अदालत से भी पहले पास के पुलिस स्टेशन की ओर उठती हैं। पुलिस की खाकी वर्दी केवल कानून लागू करने का जरिया नहीं, बल्कि एक पीड़ित के लिए उस अंतिम भरोसे का नाम है जो उसे भरोसा दिलाती है कि ‘तुम अकेले नहीं हो।’ लेकिन क्या हो जब वही खाकी वर्दी रक्षक से सौदागर बन जाए? जब पुलिस स्टेशन इंसाफ की चौखट बनने के बजाय ‘समझौते का अड्डा’ में तब्दील होने लगे?
मुंबई के मालवणी पुलिस स्टेशन से रह-रहकर सामने आने वाली तस्वीरें और पीड़ितों की आपबीती केवल एक इलाके की पुलिसिंग पर सवाल नहीं उठातीं, बल्कि यह हमारी पूरी प्रशासनिक आत्मा पर एक गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करती है।
‘कैमरा हो तो तत्परता, वरना सौदेबाजी!’
संविधान कहता है कि कानून की नजर में सब बराबर हैं, लेकिन मालवणी पुलिस की कार्यशैली देखकर लगता है कि यहाँ कानून मीडिया की मौजूदगी तय करती है।
2 अक्टूबर के उस वाकये को याद कीजिए— जब एक छोटी बच्ची और उसका पीड़ित परिवार अपनी शिकायत लेकर पहुँचा। बाहर मीडिया का जमावड़ा था, कैमरे चमक रहे थे, तो पुलिस अधिकारी बहुत मुस्तैद दिखे। त्वरित कार्रवाई का दिखावा हुआ, लेकिन पर्दे के पीछे जो खेल खेला गया, वह व्यवस्था की घिनौनी सोच को उजागर करता है। पीड़िता को मेडिकल के नाम पर रात भर से लेकर सुबह 5:30 बजे तक—लगभग आठ से नौ घंटे—उलझाकर रखा गया। सवाल यह है कि इस लंबे अंतराल की आड़ में आखिर कौन सी पटकथा लिखी जा रही थी? क्या यह पीड़ित परिवार के हौसले को तोड़ने और बैकडोर से ‘समझौता’ कराने की वही पुरानी पुलिसिया रणनीति नहीं थी?
और जब हाल ही में मालवणी गेट नंबर 07 में घटी घटना के दौरान मीडिया का सीधा पहरा नहीं था, तो खाकी का असली चरित्र खुलकर सामने आ गया। एक महिला पर कई लोग बेरहमी से हमला करते हैं, खून बहता है, लेकिन पुलिस के कान पर जूं तक नहीं रेंगती। BNS की धारा 118(1) जैसी गंभीर और गैर-जमानती धारा के तहत मामला तो दर्ज होता है, पर इंसाफ की जगह महिला को पुलिसकर्मियों से ही ‘ज्ञान’ मिलता है— “केस दर्ज कराओगी तो कोर्ट-कचहरी के चक्कर काटते थक जाओगी, इससे अच्छा है समझौता कर लो!”
खाकी की छत्रछाया में अपराधियों के बुलंद हौसले
न्याय की इससे बड़ी विडंबना क्या होगी कि जिस घटना में गैर-जमानती अपराध दर्ज हुआ हो, उसके आरोपी रात में ही पुलिस स्टेशन से आराम से घर लौट जाते हैं, और जिस महिला का खून बहा है, उसे सुबह तक थाने में नजरबंद रखा जाता है!
हद तो तब हो गई जब पीड़िता ने खाकी के इस अनैतिक दबाव के आगे झुकने से साफ इनकार कर दिया। इसके जवाब में पुलिस की कथित मौन-सहमति से आरोपी पक्ष ने पीड़िता के पति पर ही एक फर्जी ‘काउंटर-केस’ ठोक दिया। संदेश बहुत साफ और भयानक था— “अगर तुम न्याय माँगोगी, तो हम तुम्हें और तुम्हारे परिवार को ही जेल की सलाखों के पीछे पहुँचा देंगे।”
क्या पुलिस अब कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए नहीं, बल्कि अपराधियों को एक ‘सुरक्षित रास्ता’ (Safe Exit) देने के लिए काम कर रही है? अगर एक पीड़ित महिला को न्याय पाने के लिए इतनी बड़ी कीमत चुकानी पड़े, तो यह समाज के रूप में हमारी बहुत बड़ी हार है।
तबादलों का ढोंग और गृह मंत्री से उठते सीधे सवाल
मालवणी पुलिस ठाणे में अधिकारियों के चेहरे बदलते हैं, तबादलों के आदेश जारी होते हैं, लेकिन वहाँ की व्यवस्था और सोच नहीं बदलती। इससे पहले भी महिला कांस्टेबल खांडेकर के मामले में वशिष्ठ वाणी ने तंत्र की लापरवाही को उजागर किया था, लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात—विभागीय फाइलों में मामले को दफन कर दिया गया।
यह सवाल अब मालवणी के किसी सब-इंस्पेक्टर या सीनियर पीआई तक सीमित नहीं है। यह सवाल सीधे महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री और गृह मंत्री देवेंद्र फडणवीस के प्रशासनिक इकबाल से जुड़ा है:
- क्या महाराष्ट्र की कानून-व्यवस्था में पुलिस को यह अधिकार दे दिया गया है कि वह पीड़ितों पर समझौते का दबाव बनाए?
- BNS 118(1) जैसी संगीन धाराओं में नामजद आरोपियों को गिरफ्तार न करने और उन्हें संरक्षण देने वाले अधिकारियों पर तुरंत निलंबन की गाज कब गिरेगी?
- जो पुलिस स्टेशन अपराधियों के मन में डर पैदा करने के बजाय आम नागरिकों में डर पैदा कर रहे हैं, उनका हिसाब कौन लेगा?
समय है ‘सिस्टम’ की सफाई का
‘सज्जन रक्षक, दुर्जन भक्षक’ का वाक्य पुलिस की गाड़ियों और थानों की दीवारों पर लिखा एक सुंदर स्लोगन बनकर रह गया है। मालवणी पुलिस की यह कार्यशैली मुंबई पुलिस की दशकों पुरानी साख पर एक बड़ा धब्बा है।
अगर आज खाकी का यह रुख नहीं बदला गया, तो कल कोई भी आम नागरिक अपराध होने पर पुलिस स्टेशन का दरवाजा खटखटाने की हिम्मत नहीं जुटा पाएगा। गृह विभाग को यह समझना होगा कि कागजी तबादलों से काम नहीं चलेगा, अब मालवणी पुलिस स्टेशन के सिस्टम में जमी ‘दीमक’ को साफ करने के लिए कड़े और दंडात्मक कदम उठाने ही होंगे!














