नई दिल्ली/अयोध्या: एक वक्त था जब ‘मैं भी चौकीदार हूँ’ का नारा सत्ता के गलियारों से लेकर सोशल मीडिया तक गूंज रहा था। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा शुरू किए गए इस अभियान ने देश भर के नेताओं और समर्थकों को ‘चौकीदार’ बनने पर मजबूर कर दिया था। तब जनता को विश्वास दिलाया गया था कि देश की एक-एक संपत्ति और आस्था के केंद्र ‘सुरक्षित हाथों’ में हैं। लेकिन आज, जब राम मंदिर जैसे अति-संवेदनशील स्थान से चढ़ावे (चंदे) की चोरी की खबर सामने आई है, तो वही ‘चौकीदार’ का नैरेटिव मजाक बनकर रह गया है।
चौकीदार की निगरानी में चोरी?
क्या यह विडंबना नहीं है कि जिस सरकार ने ‘मैं चौकीदार हूँ’ को राष्ट्रवाद का पर्याय बनाया, उसी की नाक के नीचे राम मंदिर का चढ़ावा लुट गया? सवाल यह है कि यदि देश का ‘प्रधान चौकीदार’ अपनी ही देखरेख में बने मंदिर की सुरक्षा नहीं कर सकता, तो आम जनता अपनी सुरक्षा की उम्मीद किससे करे? क्या ‘चौकीदारी’ का अर्थ केवल भाषणों में सक्रियता दिखाना है, या फिर इसके लिए जमीनी जवाबदेही भी जरूरी है?
‘राम को लाने वाले’ आज मौन क्यों?
जो लोग यह ढिंढोरा पीटने में नहीं थकते थे कि “राम को हम लाए हैं”, वे आज राम के खजाने में हुई चोरी पर चुप्पी साधे हुए हैं। क्या मंदिर के ट्रस्ट में मोदी जी द्वारा नियुक्त किए गए लोगों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाना मना है? जिस ट्रस्ट की जिम्मेदारी पूरे मंदिर की व्यवस्था और सुरक्षा संभालने की थी, आज वही कठघरे में खड़ा है। जनता पूछ रही है कि क्या ‘चौकीदार’ का चश्मा अब धुंधला हो चुका है या वे सच देखने से डर रहे हैं?
जनता का तीखा प्रहार: ‘चौकीदारी’ बनाम ‘लूट’
सोशल मीडिया और आम जनमानस में अब यह चर्चा आम है कि जिस ‘चौकीदार’ ने भ्रष्टाचार मुक्त भारत का वादा किया था, वहां भगवान के घर में ही हाथ साफ कर दिया गया। लोगों का कहना है कि यह चोरी मात्र धन की नहीं, बल्कि उस भरोसे की है जो करोड़ों लोगों ने ‘चौकीदार’ की व्यवस्था पर किया था।
सीधा सवाल:
देश जानना चाहता है—क्या चौकीदार की नींद अब टूटेगी? या फिर ‘चौकीदार’ का यह पूरा अभियान सिर्फ एक चुनावी जुमला था जो मंदिर की सुरक्षा के वक्त ‘आउट ऑफ सर्विस’ हो गया?
यह घटना न केवल शर्मनाक है, बल्कि सत्ता की उस पूरी कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा करती है जिसने खुद को ‘चौकीदार’ घोषित कर रखा था। देखना यह है कि अब ‘चौकीदार’ इस चोरी के बाद अपनी साख बचाते हैं या फिर फिर से कोई नया जुमला फेंककर इस मुद्दे को रफा-दफा कर देते हैं।














