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विपक्ष से वशिष्ठ वाणी का सीधा सवाल: जब निष्पक्ष मीडिया सरकार को घेरता है, तब राहुल, अखिलेश, केजरीवाल और उद्धव मौन क्यों साध लेते हैं?

मुंबई/नई दिल्ली: अक्सर देश के बड़े विपक्षी नेता मंचों और रैलियों से यह दहाड़ते नजर आते हैं कि “देश में लोकतंत्र खतरे में है” और “मुख्यधारा का मीडिया सरकार से सवाल नहीं पूछ रहा है।” लेकिन आज ‘वशिष्ठ वाणी’ देश के विपक्ष के चार बड़े चेहरों—कांग्रेस नेता राहुल गांधी, सपा प्रमुख अखिलेश यादव, आप संयोजक अरविंद केजरीवाल और शिवसेना (यूबीटी) प्रमुख उद्धव ठाकरे से एक सीधा, तीखा और दो-टूक सवाल पूछना चाहती है: “जब कोई मीडिया संस्थान पूरी निष्पक्षता और निष्ठा से सत्ता से कड़े सवाल पूछता है, तब आप उस मीडिया का साथ छोड़कर मौन क्यों साध लेते हैं?”

ुविधा की राजनीति और चुनिंदा चुप्पी

यह एक कड़वी सच्चाई है कि विपक्ष को मीडिया की स्वतंत्रता सिर्फ तब याद आती है जब उन्हें अपनी राजनीति चमकानी होती है।

  • राहुल गांधी संसद से सड़क तक मीडिया पर ‘बिकने’ का आरोप तो लगाते हैं, लेकिन जब ‘वशिष्ठ वाणी’ या फिर अन्य मीडिया जैसे जमीनी संस्थान बिना डरे भ्रष्टाचार और प्रशासनिक लापरवाही को उजागर करते हैं, तब राहुल और उनकी पार्टी स्वतंत्र पत्रकारों के समर्थन में खड़े होने का साहस नहीं दिखा पाते।
  • यही हाल उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव का है, जो स्वतंत्र और डिजिटल मीडिया के संघर्षों को अनदेखा कर केवल ‘गोदी मीडिया’ का रोना रोते हैं ताकि अपनी सांगठनिक कमियों को छिपा सकें।

सवाल जब खुद पर आए, तो मीडिया ‘शत्रु’ क्यों?

दिल्ली से मुंबई तक की राजनीति देखें, तो अरविंद केजरीवाल और उद्धव ठाकरे का रवैया भी इससे अलग नहीं है। निष्पक्ष पत्रकारिता का सिद्धांत यह है कि सवाल सत्ता से भी होंगे और विपक्ष के कार्यों पर भी। लेकिन जैसे ही इन नेताओं की कार्यशैली या इनके क्षेत्र की कमियों पर तीखे सवाल पूछे जाते हैं, ये तुरंत मीडिया को अपना ‘शत्रु’ मान लेते हैं।

‘वशिष्ठ वाणी’ इन नेताओं से पूछती है कि क्या आपका यह कर्तव्य नहीं है कि जो मीडिया जनता की आवाज बन रहा है, आप अपनी राजनीतिक ताकत को उसके साथ जोड़ें? या फिर आपके मन में भी यही धारणा बैठ चुकी है कि—“मीडिया का साथ देने की क्या जरूरत है, जैसे चल रहा है वैसे चलने दो, आखिर जनता को बेवकूफ ही तो बनाना है!”

वशिष्ठ वाणी का स्पष्ट रुख: हमारा धर्म केवल पत्रकारिता है

विपक्ष के नेताओं को यह अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि जिस दिन आप ज़मीन पर लड़ रहे निष्पक्ष पत्रकारों का भरोसा जीत लेंगे, काफी हद तक मीडिया आपके साथ खड़ा दिखाई देगा। लेकिन अगर आपकी नीयत में केवल राजनीति चमकाना है और धरातल पर कोई सुधार नहीं करना है, तो फिर ‘गोदी मीडिया’ से चिढ़ना बंद कर दीजिए, क्योंकि आपकी और उनकी सोच में कोई अंतर नहीं रह जाता।

‘वशिष्ठ वाणी’ यह साफ कर देना चाहती है:

“आप हमारा साथ दें या न दें, हम सत्ता की नाकामियों पर भी उंगली उठाएंगे और विपक्ष की चुनिंदा चुप्पी को भी बेनकाब करते रहेंगे। हमारी कलम किसी के राजनीतिक नफे-नुकसान की मोहताज नहीं है।”

— संपादक, वशिष्ठ वाणी न्यूज़

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