विशेष रिपोर्ट (नई दिल्ली): राजनीतिक विश्लेषक और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर तहसीन पूनावाला का दिल्ली पुलिस की एक वरिष्ठ महिला आईपीएस (IPS) अधिकारी के साथ बहस का वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आने के बाद बहस छिड़ गई है। पूनावाला ने पुलिस पर आरोप लगाया है कि उन्हें निर्धारित मीडिया स्पॉट पर बयान (बाइट) देने से रोकने के लिए जानबूझकर एक सीनियर अधिकारी को तैनात किया गया था।
सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर पोस्ट शेयर करते हुए पूनावाला ने लिखा कि वे दिल्ली पुलिस का सम्मान करते हैं, लेकिन अपने स्टैंड पर कायम रहेंगे। उन्होंने केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी पर एथेनॉल मुद्दे को लेकर आरोप भी लगाए।
इस घटनाक्रम के बाद जनता के बीच यह सवाल उठ रहा है कि क्या पुलिस बिना किसी लिखित आदेश के किसी व्यक्ति को मीडिया से बात करने से रोक सकती है और इस संबंध में देश का कानून और संविधान क्या कहता है?
क्या कहता है भारत का कानून और संविधान?
1. क्या पुलिस बिना लिखित आदेश के बाइट देने से रोक सकती है?
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, पुलिस किसी भी नागरिक को मीडिया के समक्ष अपनी बात रखने से केवल मौखिक आदेश देकर नहीं रोक सकती। जब तक कि संबंधित क्षेत्र में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 (पूर्व में IPC धारा 144) लागू न हो, या वह अति-संवेदनशील/सुरक्षा घेरे वाला क्षेत्र न हो, तब तक किसी नागरिक को अपनी राय व्यक्त करने से रोकना गैर-कानूनी है। किसी विशिष्ट व्यक्ति को रोकने के लिए पुलिस के पास लिखित और वैध प्रशासनिक/कानूनी आदेश होना अनिवार्य है।
2. क्या सांसद/विधायक के स्थान पर आम नागरिक बाइट नहीं दे सकता?
संविधान में ऐसा कोई नियम या प्रावधान नहीं है। भारत का अनुच्छेद 14 (समता का अधिकार) स्पष्ट करता है कि कानून की नजर में सभी नागरिक समान हैं—चाहे वे जनप्रतिनिधि (सांसद/विधायक) हों या आम नागरिक। यदि किसी स्थान पर मीडिया को बाइट देने की अनुमति है, तो वहां केवल जनप्रतिनिधियों को बोलने का अधिकार होना और आम नागरिकों को रोकना पूरी तरह असंवैधानिक है।
3. अभिव्यक्ति की आजादी का अधिकार
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) प्रत्येक नागरिक को ‘वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ (Freedom of Speech and Expression) प्रदान करता है। मीडिया को बयान या बाइट देना इसी मौलिक अधिकार का हिस्सा है।
4. पुलिस कब और किस आधार पर रोक सकती है?
अनुच्छेद 19(2) के तहत राज्य या पुलिस नागरिक की अभिव्यक्ति पर केवल तभी सीमित प्रतिबंध लगा सकती है जब:
- देश की संप्रभुता और अखंडता पर खतरा हो।
- राज्य की सुरक्षा या सार्वजनिक व्यवस्था (Public Order) बिगड़ने की आशंका हो।
- अदालत की अवमानना या मानहानि का मामला हो।
यदि सार्वजनिक व्यवस्था या सुरक्षा का कोई प्रत्यक्ष खतरा नहीं है, तो पुलिस द्वारा किसी नागरिक को मीडिया से बात करने से रोकना उसके संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन माना जाता है।












