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जीएसटी का बोझ आखिर सिर्फ जनता पर क्यों? मुनाफा व्यापारी का और टैक्स भी जनता दे — यह कैसा सिस्टम?

मुम्बई/ विशेष रिपोर्ट – वशिष्ठ वाणी

देश में लागू जीएसटी व्यवस्था को लेकर एक बड़ा सवाल लगातार उठ रहा है — आखिर हर जगह टैक्स का बोझ केवल आम जनता पर ही क्यों डाला जा रहा है?

जब भी कोई व्यक्ति बाजार में सामान खरीदता है, किसी रेस्टोरेंट में खाना खाता है या किसी होटल में ठहरता है, तो उसे सेवा या वस्तु का मूल्य चुकाने के साथ-साथ जीएसटी भी देना पड़ता है।

यानी एक तरफ व्यापारी अपना मुनाफा कमा रहा है और दूसरी तरफ उसी लेन-देन पर लगने वाला टैक्स भी ग्राहक की जेब से ही वसूला जा रहा है।

वशिष्ठ वाणी न्यूज़ इस मुद्दे को देश के करोड़ों उपभोक्ताओं की आवाज़ बनकर उठा रही है, क्योंकि हर नागरिक किसी न किसी रूप में जीएसटी का भुगतान कर रहा है।

हर जगह ग्राहक ही क्यों बने टैक्सदाता?

आज स्थिति यह है कि

  • रेस्टोरेंट में खाना खाओ – बिल के साथ जीएसटी
  • होटल में ठहरो – बिल के साथ जीएसटी
  • कपड़े खरीदो – जीएसटी
  • इलेक्ट्रॉनिक सामान लो – जीएसटी

यानी ग्राहक पहले वस्तु या सेवा की कीमत देता है, फिर उसी पर अलग से टैक्स भी भरता है।

सवाल यह उठता है कि जो व्यापारी उस वस्तु या सेवा से मुनाफा कमा रहा है, वह खुद यह टैक्स क्यों नहीं देता?

सरकार से सवाल

वशिष्ठ वाणी न्यूज़ केंद्र सरकार और विपक्ष दोनों से यह जानना चाहती है कि क्या कोई ऐसा नियम बनाया गया है जिसमें आम जनता से कहा गया हो कि वह खर्च भी करे और उसी पर टैक्स भी भरे?

अगर ऐसा नहीं है, तो फिर हर बिल में जीएसटी सीधे ग्राहक से क्यों लिया जाता है?

सरकार को यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि आखिर आम जनता पर लगातार आर्थिक बोझ क्यों बढ़ाया जा रहा है।

बढ़ती असमानता

आर्थिक जानकारों का भी मानना है कि जब टैक्स का बोझ सीधे उपभोक्ता पर पड़ता है तो इसका असर समाज के कमजोर वर्गों पर ज्यादा पड़ता है।

एक ओर बड़े व्यापारी और कंपनियां मुनाफा बढ़ाती जा रही हैं, वहीं दूसरी ओर आम नागरिक रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करने में ही जूझ रहा है।

मीडिया की टिप्पणी

यह व्यवस्था कहीं न कहीं उस मानसिकता को भी दर्शाती है जिसमें आम जनता को केवल “राजस्व का स्रोत” मान लिया गया है।

विडंबना यह है कि जिस जनता के पैसे से सरकारें चलती हैं, उसी जनता को हर छोटी-बड़ी जरूरत पर टैक्स देकर अपनी जेब ढीली करनी पड़ती है।

कटाक्ष

कभी इस देश पर अंग्रेजों ने शासन किया था और जनता से हर तरह का कर वसूला जाता था। आज परिस्थितियां बदल चुकी हैं, लेकिन कई लोगों को लगता है कि व्यवस्था का तरीका कुछ-कुछ वैसा ही दिखाई देता है।

फर्क सिर्फ इतना है कि पहले कर वसूलने वाले अंग्रेज थे, और आज यह जिम्मेदारी हमारे ही चुने हुए प्रतिनिधियों और व्यवस्था के हाथ में है।

जनता से सवाल

वशिष्ठ वाणी न्यूज़ जनता से भी एक सवाल पूछना चाहती है —

  • क्या हर नियम को बिना सवाल किए स्वीकार करना ही लोकतंत्र है?
  • क्या जनता को यह अधिकार नहीं कि वह पूछे — आखिर टैक्स का असली बोझ कौन उठाए?

जब तक समाज सवाल पूछना नहीं सीखेगा, तब तक व्यवस्था में बदलाव की उम्मीद करना मुश्किल होगा।

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