
• लेख: अभिषेक अनिल वशिष्ठ •
(वशिष्ठ मीडिया हाउस प्राइवेट लिमिटेड के चेयरमैन एवं समूह दैनिक समाचार पत्र के स्वामी/प्रकाशक)
आज जब मैं देश के मौजूदा राजनीतिक, प्रशासनिक और सामाजिक माहौल को देखता हूँ, तो मन में गहरी निराशा और कई यक्ष प्रश्न खड़े होते हैं। एक स्वतंत्र पत्रकार और मीडिया संस्थान से जुड़े होने के नाते पिछले कई वर्षों में मैंने सत्ता के बदलते स्वरूपों को बहुत करीब से देखा है। चाहे किसी भी दल की सरकार रही हो—चाहे अतीत की सत्ताएँ रही हों या आज का दौर—सत्ता का मूल चरित्र हमेशा एक जैसा रहा है: अहंकार, जनता से दूरी और जवाबदेही से भागना।
लेकिन आज स्थिति इसलिए अधिक भयावह हो चुकी है क्योंकि लोकतंत्र का चौथा स्तंभ यानी मीडिया, जो कभी सत्ता की आँखों में आँखें डालकर सवाल पूछता था, उसने अपनी रीढ़ की हड्डी नीलाम कर दी है।
1. मुद्दों से भटकाव और गोदी मीडिया का नंगा नाच
आज गोदी मीडिया ने अपनी ही साख की ऐसी धज्जियाँ उड़ाई हैं कि जनता अब उनसे नफरत करने लगी है। लेकिन अफ़सोस की बात यह है कि मुख्यधारा का मीडिया असल सवालों को दिखाने के बजाय केवल अपनी टीआरपी और ‘विक्टिम कार्ड’ खेलने में व्यस्त है।
जनता से जुड़े असली मुद्दे क्या हैं? राम मंदिर के नाम पर एकत्र हुए चंदे में धांधली और भ्रष्टाचार के आरोप, पेपर लीक से बर्बाद होता लाखों युवाओं का भविष्य, और बढ़ती महँगाई व बेरोज़गारी। लेकिन टीवी चैनलों पर क्या दिखाया जा रहा है? जंतर-मंतर पर कुछ युवाओं द्वारा भाषा की मर्यादा लाँघकर “सीता के पति…” जैसे अमर्यादित और अवांछनीय बयानों को पकड़कर बहस छेडना और धर्म के नाम पर समाज को आपस में लड़ाना।
हद तो तब हो जाती है जब भाषा की मर्यादा टूटने या बयानों पर तो लोग तुरंत आग-बबूला हो जाते हैं, लेकिन जब स्वयं राम मंदिर के चंदे में कथित ‘चोरी’ का मामला आता है, तो सब चुप्पी साध लेते हैं। क्या आस्था सिर्फ अनुचित शब्दों या बयानों से आहत होती है? प्रभु राम के नाम पर हुए छल और भ्रष्टाचार से किसी की आस्था को ठेस नहीं पहुँचती? सच तो यह है कि आज जनता को इस कदर बाँट दिया गया है कि वह अपने ही अधिकारों की लड़ाई भूलकर धार्मिक विवादों और फुसफुसाहटों में उलझ कर रह गई है।
2. जंतर-मंतर का सच: जब रक्षक ही पहचान छिपाने लगे
हाल ही में जंतर-मंतर पर अपने भविष्य के लिए न्याय माँग रहे युवाओं के साथ जो हुआ, वह इस तंत्र की निरंकुशता की पराकाष्ठा है। बिना वर्दी, बिना नाम के बैज और चप्पलों में घूमते पुलिसकर्मियों ने जिस प्रकार शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के साथ रवैया अपनाया, वह यह साबित करता है कि कानून लागू करने वाली एजेंसियाँ अब जनता की सुरक्षा के लिए नहीं, बल्कि सत्ता के अहंकार को बचाने के लिए ढाल की तरह काम कर रही हैं। जब पुलिस अपनी पहचान छिपाकर कार्रवाई करने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि लोकतंत्र में कानून का नहीं, बल्कि खौफ का राज स्थापित करने की कोशिश हो रही है।
3. ‘पब्लिक सर्वेंट’ से ‘रूलर’ बनने का खेल
यह अहंकार केवल नेताओं तक सीमित नहीं है, इसने हमारी अफ़सरशाही की जड़ों को भी खोखला कर दिया है। एक आईएएस अधिकारी परीक्षा की तैयारी के दौरान साक्षात्कार में बड़ी-बड़ी बातें करता है—”मैं जनसेवा करना चाहता हूँ”, “ग़रीबों की मदद करना चाहता हूँ।” लेकिन पद मिलते ही वही व्यक्ति आम जनता के लिए अप्रैप्य हो जाता है। प्रोटोकॉल और लाल बत्ती के पीछे छिपकर वह खुद को राजा और जनता को ‘प्रजा’ समझने लगता है।
राजनीति का भी यही आलम है। चुनाव के दिनों में जो नेता आपके दरवाज़े पर हाथ जोड़े खड़े रहते हैं, जीतने के बाद उनके दर्शन करने के लिए महीनों इंतज़ार करना पड़ता है। चाहे बीजेपी हो, कांग्रेस हो, या कोई अन्य क्षेत्रीय दल—सत्ता में आते ही सबका एक ही मकसद होता है: जनता को गुमराह करो और सत्ता पर कब्ज़ा बनाए रखो। लोकतंत्र का तकाज़ा तो यह है कि नेता 5 साल तक जनता का सेवक बनकर रहे, लेकिन आज व्यवस्था ऐसी बन गई है जहाँ जनता 5 साल तक नेताओं और अफ़सरों की ग़ुलाम बनकर रह जाती है।
4. निष्पक्षता का जोखिम: 10 दोस्त और 100 दुश्मन
आज के दौर में जब कोई सच्चा पत्रकार या सजग नागरिक सच बोलने का साहस करता है, तो उसके 10 दोस्त बनते हैं और 100 दुश्मन। सत्ताधारी दल आपको देशद्रोही कहेगा, तो विपक्ष आपको अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करना चाहेगा। जनता को भी ‘अपनी पसंद का सच’ सुनने की आदत डाल दी गई है।
लेकिन क्या इस डर से सच बोलना छोड़ दिया जाए? बिल्कुल नहीं।
अगर आज हम चुप रहे, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें कभी माफ नहीं करेंगी। व्यवस्था तब तक नहीं बदलेगी जब तक जनता एक ‘भक्त’ या ‘अंधसमर्थक’ बनना छोड़कर एक ‘जागरूक नागरिक’ की तरह सवाल पूछना शुरू नहीं करेगी। राजनेताओं और अफ़सरों को यह याद दिलाना होगा कि उनकी गाड़ियाँ, उनकी सुरक्षा और उनकी तनख़्वाहें जनता के खून-पसीने की कमाई (टैक्स) से चलती हैं।
माहौल कितना भी निराशाजनक क्यों न हो, जब तक लोकतंत्र में सवाल पूछने वाली आवाज़ें ज़िंदा हैं, तब तक इस सत्ताधारी अहंकार को चुनौती मिलती रहेगी। सच कड़वा हो सकता है, लेकिन यही आज के भारत का सबसे बड़ा सच है।














