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व्यवस्था का बहरापन और ‘डिजिटल अदालत’ की दस्तक: मुख्यमंत्री जी, अब ‘ऑन-स्पॉट सस्पेंशन’ ही एकमात्र इलाज है!

• लेखअभिषेक अनिल वशिष्ठ •
(वशिष्ठ मीडिया हाउस प्राइवेट लिमिटेड के चेयरमैन एवं समूह दैनिक समाचार पत्र के स्वामी/प्रकाशक)


लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि यहाँ जनता को ‘जनार्दन’ यानी ईश्वर का दर्जा सिर्फ चुनाव की तारीखों तक ही हासिल रहता है। जैसे ही मतपेटियां सील होती हैं, जनता का वह ‘ईश्वरत्व’ प्रशासनिक फाइलों के नीचे दफन हो जाता है। चुनाव के समय गली-कूचों में हाथ जोड़कर घूमने वाले राजनेता और सत्ता के रसूख में डूबी अफ़सरशाही कुर्सी मिलते ही जनता की चीखों के प्रति ‘बधिर’ यानी बहरी हो जाती है।

पहले भी यही रोना था, आज भी यही हकीकत है—अफ़सरशाही तब भी नहीं सुनती थी, अफ़सरशाही अब भी नहीं सुनती! आज ‘वशिष्ठ वाणी’ महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के समक्ष पूरे देश के प्रशासनिक ढांचे को बदलने वाला एक ऐसा क्रांतिकारी और अचूक ब्लूप्रिंट रख रहा है, जिसे पढ़कर हर संवेदनशील नागरिक की अंतरात्मा पुकार उठेगी कि “हाँ, यह कानून हर हाल में बनना ही चाहिए!”

रक्षकों का मौन और कछुए की चाल: कब तक सहेगी जनता?

मुंबई के कांदिवली, मलाड, मालवणी से लेकर गोरेगांव तक के जमीनी हालात इस अफ़सरशाही के अहंकार की जीती-जागती गवाही हैं। सामना नगर (मालवणी गेट नंबर 8) में म्हाडा की सरकारी जमीन पर आपातकालीन रास्ते को ब्लॉक करके अवैध निर्माण खड़ा कर दिया जाता है, लेकिन म्हाडा के अधिकारी फेविकोल लगाकर अपनी कुर्सियों पर चिपके रहते हैं। मालवणी पुलिस स्टेशन में एक मामूली एनओसी (NOC) की फाइल को आगे खिसकाने में एक अधिकारी पूरे तीन महीने यानी 90 दिन का समय लगा देता है! वहीं गोरेगांव के डिप्टी कलेक्टर साहब की नाक के नीचे सरकारी जमीनों को भू-माफिया लील रहे हैं, और तंत्र आंखें मूंदकर बैठा है। मलाड न्यू लिंक रोड पर ट्रैफिक माफियाओं ने पूरी सड़क को बंधक बना लिया है।

जब कोई थक-हारकर सोशल मीडिया (ट्विटर/X) पर आरटीओ या ट्रैफिक विभाग को टैग करता है, तो सिर्फ ‘शिकायत फॉरवर्ड’ करने का एक स्वचालित, बेजान कागजी खेल खेल दिया जाता है। धरातल पर कार्रवाई शून्य होती है। ये अधिकारी आज सिर्फ तीन ताकतों के गुलाम बन चुके हैं—वे नेता जो इनका मनचाहा तबादला करवा सकें, वे रसूखदार जो मामलों को रफा-दफा करने का ‘जुगाड़’ जानते हों, या फिर बिचौलिए। लोकतंत्र का चौथा स्तंभ और आम नागरिक इस सिंडिकेट के सामने खुद को असहाय पाता है। क्या इसी डिजिटल सुशासन का ढोल पीटा जा रहा था?

‘वशिष्ठ वाणी’ का प्रस्ताव: २ सूत्रीय डिजिटल क्रांति कानून

इस निरंकुश और संवेदनहीन हो चुके तंत्र को घुटनों पर लाने के लिए ‘वशिष्ठ वाणी’ सीधे मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO) से दो ऐतिहासिक कानून बनाने की मांग करती है:

१. ‘सोशल मीडिया’ बने त्वरित न्याय की ‘डिजिटल अदालत’

मुख्यमंत्री कार्यालय का ट्विटर/X हैंडल सिर्फ और सिर्फ सरकारी विज्ञापनों, दौरों और आत्ममुग्ध पीआर (PR) का जरिया बनकर न रह जाए। हमारी मांग है कि इसे ‘डिजिटल ग्रीवेंस कमांड सेंटर’ में बदला जाए। इसके तहत एक ऐसी निष्ठावान ‘विशेष टास्क फोर्स’ (Special Team) का गठन हो, जिसका एकमात्र काम सोशल मीडिया पर जनता और प्रामाणिक मीडिया द्वारा साक्ष्यों के साथ भेजी गई शिकायतों पर सीधे एक्शन लेना हो।

२. ‘नो-टॉलरेंस’ और ‘ऑन-स्पॉट सस्पेंशन’ का नियम

इस कानून की आत्मा इसके कड़े रुख में होनी चाहिए। जैसे ही मुख्यमंत्री की विशेष टीम किसी शिकायत को प्रमाणित पाए, संबंधित विभाग के अधिकारी को तत्काल कार्रवाई का अल्टीमेटम मिले। यदि तय समय-सीमा के भीतर उस अधिकारी ने अवैध कब्जे, जानलेवा पार्किंग या प्रशासनिक ढिलाई पर जमीनी एक्शन नहीं लिया, तो उसे किसी लंबी विभागीय जांच की ढाल देने के बजाय तत्काल प्रभाव से निलंबित (Instantly Suspend) कर दिया जाए।

क्यों यह कानून जनता के लिए ‘संजीवनी’ बनेगा?

जब तक अफ़सरों के मन में अपनी मखमली कुर्सी और सुरक्षित नौकरी खोने का खौफ नहीं होगा, तब तक इस देश के आम आदमी की किस्मत नहीं बदलेगी। जिस दिन यह कानून लागू हो गया, उस दिन किसी लाचार बुजुर्ग, पीड़ित नागरिक या पत्रकार को अपने छोटे-छोटे हकों के लिए अदालतों और सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट-काटकर चप्पलें नहीं घिसनी पड़ेंगी। अफ़सरशाही का यह रूतबा और अहंकार २४ घंटे में काफूर हो जाएगा, क्योंकि उन्हें पता होगा कि उनकी जवाबदेही किसी स्थानीय रसूखदार नेता के प्रति नहीं, बल्कि सीधे जनता और मुख्यमंत्री के डिजिटल हंटर के प्रति है।

हम मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस जी से अपील करते हैं कि वे इस जनहितैषी कानून को लागू कर एक ऐसा इतिहास रचें, जिससे जनता को यह भरोसा मिले कि उनका मुखिया सिर्फ चुनाव जीतने तक राजा नहीं है, बल्कि चुनाव के बाद भी उनके अधिकारों का सबसे बड़ा रक्षक है।

महाराष्ट्र की यह पावन धरती हमेशा से क्रांतियों की जननी रही है। वक्त आ गया है कि अफ़सरशाही की इस मनमर्जी को दफन करने के लिए एक ऐसी प्रशासनिक क्रांति की शुरुआत हो, जिसे देखकर पूरा भारतवर्ष गर्व से कहे—“हाँ, जनता को राहत देने वाला यह कानून देश के हर कोने में ज़रूर बनना चाहिए!”

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