लोकप्रिय विषयमहाराष्ट्रसम्पादकीयकवितास्वास्थ्यअपराधअन्यवीडियो

क्या ‘धर्मरक्षक’ होने का दावा करने वाले ही निकले ‘आस्था के लुटेरे’? राम मंदिर चढ़ावा विवाद पर जनता का तीखा सवाल

अयोध्या। भारत की राजनीति में पिछले एक दशक से ‘हिंदू और धर्म को बचाने’ का नैरेटिव सबसे बड़ा मुद्दा रहा है। 2014 से लेकर अब तक, सत्ता के गलियारों में यही गूंज सुनाई देती रही कि यदि हिंदू को बचाना है, तो एक विशेष राजनीतिक विचारधारा को ही चुनना होगा। विकास के नारों से शुरू हुआ यह सफर अब पूरी तरह से ‘धर्म की सुरक्षा’ पर आकर टिक गया है। लेकिन, अयोध्या स्थित श्री राम जन्मभूमि मंदिर में हुए चढ़ावे की चोरी और वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों ने उस पूरे नैरेटिव को कटघरे में खड़ा कर दिया है।

सत्ता का नारा बनाम जमीनी हकीकत

कभी जो लोग खुद को ‘हिंदू हृदय सम्राट’ और ‘धर्म का रक्षक’ बताते नहीं थकते थे, आज उनके समर्थकों और सहयोगियों पर ही ‘राम के घर’ में चोरी करने के आरोप लग रहे हैं। सवाल यह है कि:

  • क्या धर्म बचाना केवल एक राजनीतिक नारा था?
  • क्या ‘विकास’ को हटाकर ‘धार्मिक सुरक्षा’ का एजेंडा केवल सत्ता में बने रहने का एक साधन है?
  • जब रक्षक ही भक्षक बन जाए, तो आम हिंदू अपनी आस्था की सुरक्षा कहां तलाशे?

जनता पूछ रही है: रक्षक या सत्ता के पुजारी?

आज जनता के मन में यह मलाल है कि उन्होंने जिस भरोसे के साथ अपनी आस्था की बागडोर सौंपी थी, क्या वह सुरक्षित है? पूर्व अकाउंट इंचार्ज द्वारा करोड़ों की अनियमितता के दावे और चोरी के मामलों ने इस संदेह को पुख्ता कर दिया है कि कहीं धर्म के नाम पर लूट तो नहीं मची है?

सत्ताधारी दल के लिए अब यह बचाव करना मुश्किल हो रहा है कि वे ‘विपक्ष की साजिश’ का हवाला देकर कब तक बचेंगे। जब जांच एजेंसियों पर ही सवाल उठने लगें और मुख्य आरोपी खुले घूम रहे हों, तो यह स्वाभाविक है कि आम आदमी यह पूछेगा— क्या आप वाकई धर्म बचाने आए थे, या धर्म के नाम पर केवल राजनीति और लूट का खेल खेलने?

अब जनता का क्या जवाब?

यह समय केवल आरोप-प्रत्यारोप का नहीं है, बल्कि आत्ममंथन का है। जो लोग अब तक आंखें मूंदकर समर्थन करते आए थे, उन्हें आज अपनी अंतरात्मा से यह पूछना होगा:

  1. क्या कोई राजनीतिक दल वास्तव में धर्म से बड़ा हो सकता है?
  2. क्या ‘राम’ का नाम लेकर ‘राम के चढ़ावे’ को लूटने वालों को संरक्षण देना ही धर्म की सेवा है?

यह मामला अब केवल एक आपराधिक जांच तक सीमित नहीं रह गया है। यह उस विश्वास की परीक्षा है जो करोड़ों हिंदुओं ने राम मंदिर के निर्माण में निवेश किया था। आज देश का हर जागरूक नागरिक यह पूछ रहा है कि क्या राम मंदिर का निर्माण केवल सत्ता के लिए था, या यह वाकई हमारी संस्कृति का केंद्र है जिसे बचाना हमारा धर्म है?

अब वक्त आ गया है कि जनता सवाल पूछे। क्या धर्म की आड़ में खेली जा रही यह राजनीति हिंदू समाज को एकजुट कर रही है या उसे विश्वासघात की आग में झोंक रही है?

Join WhatsApp

Join Now

और पढ़ें

वशिष्ठ वाणी विशेष: लोकतंत्र में ‘सवाल’ पूछना हक है, तो फिर इसे ‘महाराष्ट्र का अपमान’ क्यों बताया जा रहा है?

‘वशिष्ठ वाणी’ महा-अभियान: नाम बड़ा और दर्शन छोटे! मालाड में VIBGYOR स्कूल की बसों ने मुख्य सड़क को बनाया ‘निजी पार्किंग’; गोरेगांव ट्रैफिक विभाग और RTO को खुली चुनौती, आखिर किसने दी अनुमति?

श्री संवतिलाल खंडवाला मार्ग रोड पर अवैध पार्किंग का ‘साम्राज्य’; आधा रास्ता बंद होने से रोज़ लग रहा भीषण जाम, कहाँ सोया है ट्रैफिक विभाग?

बारिश ने खोली पोल: मालाड के जनकल्याण नगर में गड्ढा भरने के बजाय बीएमसी ने खड़ा किया तमाशा, ३ दिन से जनता राम भरोसे!

‘वशिष्ठ वाणी’ महा-खुलासा: राम मंदिर महा-चोरी के बाद ट्रस्टियों में मची भगदड़; चंपत राय-अनिल मिश्रा का इस्तीफा, कोषाध्यक्ष की ‘लेटर पॉलिटिक्स’ पर खड़े हुए १० तीखे सवाल!

‘वशिष्ठ वाणी’ विशेष पड़ताल: राम मंदिर में ‘आस्था की डकैती’ और SIT का कानूनी ढोंग; दागी ट्रस्टियों के आगे नतमस्तक हुआ तंत्र, जागो राम भक्तों जागो!

Leave a Comment