
• लेख: अभिषेक अनिल वशिष्ठ •
(वशिष्ठ मीडिया हाउस प्राइवेट लिमिटेड के चेयरमैन एवं समूह दैनिक समाचार पत्र के स्वामी/प्रकाशक)
भारतीय जनमानस में राम केवल एक नाम नहीं, बल्कि मर्यादा, त्याग और सत्य का वह मानक हैं, जिसके आधार पर सदियों से समाज अपनी नैतिकता को मापता आया है। लेकिन आज, जब हम राम मंदिर के वर्तमान परिदृश्य को देखते हैं, तो हृदय में एक गहरा शून्य और आक्रोश का भाव पैदा होता है। वह राम मंदिर, जिसे करोड़ों हिंदुओं ने अपनी श्रद्धा का केंद्र मानकर दशकों तक संघर्ष किया, आज एक ऐसी राजनीति की भेंट चढ़ गया है, जहाँ भक्ति गौण और सत्ता-लोलुपता प्रधान हो गई है।
धर्म का राजनीतिकरण और शास्त्रोक्त मर्यादा का हनन
हमारे शास्त्रों में स्पष्ट निर्देश हैं कि दैवीय कार्यों का संपादन पूरी शुचिता, विधि-विधान और मर्यादा के साथ होना चाहिए। परंतु, जिस जल्दबाजी में राम मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा की गई, वह किसी आध्यात्मिक अनुष्ठान से अधिक राजनीतिक उपलब्धि का प्रदर्शन प्रतीत हुआ। यह जल्दबाजी उस ‘राजनीतिक एजेंडे’ का हिस्सा थी, जिसके माध्यम से यह संदेश देने का प्रयास किया गया कि ‘जो राम को लाए हैं, हम उनको लाएंगे।’ लेकिन आज जनता यह देख रही है कि जिस अहंकार के साथ धर्म को एक राजनीतिक हथियार बनाया गया, वह राम की मर्यादा के विपरीत था।
चंदे की चोरी और जिम्मेदारों का मौन
आज सबसे बड़ा प्रश्न उस ‘कथित हिंदू रक्षक’ वर्ग की चुप्पी है, जो कल तक मंदिर के नाम पर क्रेडिट लेने में सबसे आगे था। जब मंदिर परिसर से जुड़े चढ़ावे, प्रबंधन और चंदे के दुरुपयोग की खबरें सामने आ रही हैं, तो वे लोग पूरी तरह मौन हैं। यह मौन केवल एक चुप्पी नहीं, बल्कि उस दावे की पोल खोल रहा है जिसके तहत यह कहा गया था कि वे हिंदुओं के रक्षक हैं। क्या यह रक्षक होने का प्रमाण है, या फिर धर्म को अपनी सत्ता की रक्षा का कवच बनाने की एक सोची-समझी साजिश? जब ‘राम के काम’ में ही पारदर्शिता नहीं है, तो फिर आम नागरिक का भविष्य सुरक्षित कैसे होगा? आज यह प्रश्न हर उस भक्त के मन में है, जो ठगा हुआ महसूस कर रहा है।
डराने-धमकाने की राजनीति और जनता का मोहभंग
लंबे समय तक धर्म के नाम पर समाज को डराकर, ‘हिंदू-मुस्लिम’ का ध्रुवीकरण करके और लोगों को भावनात्मक रूप से बरगलाकर सत्ता हासिल करने वालों को अब अपनी जमीन खिसकती हुई दिखाई दे रही है। उन्होंने सोचा था कि जनता धर्म के नाम पर सब कुछ भूल जाएगी, लेकिन सच यह है कि जनता अब जागरूक हो गई है। आज का भक्त यह देख रहा है कि कैसे मंदिर का उपयोग सत्ता पाने के लिए किया गया और कैसे ‘हिंदू धर्म’ का नाम लेकर लोगों को लूटा गया। आज जो सत्ताधारी कल तक अपनी पीठ थपथपा रहे थे, वे आज जनता के सवालों से बच रहे हैं।
अब बहुत हुआ: जनता का जागरण ही एकमात्र विकल्प
आज जनता के सामने एक ज्वलंत प्रश्न है—“जो राम का न हो सका, वह हमारा क्या होगा?” जिस दल ने धर्म के नाम पर करोड़ों की भावनाओं का सौदा किया और मंदिर को व्यापार का केंद्र बना दिया, क्या वह राष्ट्र की सेवा के प्रति कभी ईमानदार हो सकता है? यह अब स्पष्ट हो चुका है कि उनके लिए राम केवल एक राजनीतिक उपकरण थे।
अब समय आ गया है कि समाज, विशेषकर राम भक्त, अपनी भावनात्मक जंजीरों को तोड़कर सत्य की कसौटी पर अपनी प्राथमिकताएं तय करें। धर्म का अर्थ केवल नारे लगाना नहीं, बल्कि अधर्म के विरुद्ध खड़ा होना है। यदि हम वास्तव में राम के भक्त हैं, तो हमें उस व्यवस्था को उखाड़ फेंकना होगा जो उनके नाम पर धर्म का बाजारीकरण कर रही है। अब जनता को जागना होगा, क्योंकि धर्म की आड़ में की गई यह लूट अब और बर्दाश्त नहीं की जाएगी। जो राम का नहीं, वह राष्ट्र का कभी नहीं हो सकता। यह समय मौन रहने का नहीं, बल्कि जवाबदेही तय करने का है।














