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विशेष रिपोर्ट: आरटीओ की ‘फॉरवर्डिंग पॉलिटिक्स’ और सड़कों पर रेंगता मलाड; शिकायतों के बाद भी न्यू लिंक रोड पर अवैध वाहनों का डेरा!

कागजी कार्रवाई में उलझा न्याय: लगातार शिकायतों के बावजूद मलाड न्यू लिंक रोड पर अवैध पार्किंग पर आरटीओ का रवैया उदासीन।

ब्यूरो, मुंबई/संसद वाणी:

मुंबई महानगर को ट्रैफिक जाम से मुक्ति दिलाने के लिए राज्य सरकार और प्रशासन भले ही बड़े-बड़े दावे करे और करोड़ों रुपये की ‘मुहिम’ चलाए, लेकिन जमीनी हकीकत आज भी ढाक के तीन पात जैसी है। महानगर के सबसे व्यस्ततम मार्गों में से एक मलाड न्यू लिंक रोड (Malad New Link Road) पर अवैध रूप से खड़े वाहनों और लावारिस गाड़ियों का अंबार इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। लेकिन इस समस्या से भी ज्यादा गंभीर और चौंकाने वाला पहलू मुंबई प्रादेशिक परिवहन कार्यालय (RTO) और ट्रैफिक पुलिस विभाग का वो रवैया है, जो सजग नागरिकों की शिकायतों को सिर्फ कागजों और सोशल मीडिया पर घुमाने का काम कर रहा है।

‘शिकायत फॉरवर्ड’ का रटा-रटाया खेल: कार्रवाई के नाम पर शून्य!

‘वाशिष्ठ मीडिया हाउस’ के खोजी ब्यूरो को मिले दस्तावेजों और सबूतों के अनुसार, मलाड न्यू लिंक रोड पर लगातार बढ़ रहे इस अवैध वाहन पार्किंग के खिलाफ एक जागरूक नागरिक और शिकायतकर्ता द्वारा मुंबई आरटीओ को लगातार आधिकारिक शिकायतें और सबूत भेजे जा रहे हैं। लेकिन हर बार आरटीओ के पास से सिर्फ एक ही स्वचालित (Automated) या रटा-रटाया जवाब आता है—“हमने आपकी शिकायत संबंधित विभाग/डिपार्टमेंट को फॉरवर्ड (अग्रेषित) कर दी है।”

सवाल यह उठता है कि शिकायत फॉरवर्ड होने के हफ्तों और महीनों बाद भी धरातल पर गाड़ियां क्यों नहीं हटतीं? कार्रवाई हो रही है या नहीं, इसका कोई ठोस प्रमाण या ‘कार्रवाई रिपोर्ट’ (Action Taken Report) शिकायतकर्ता को क्यों नहीं दी जाती? क्या आरटीओ का काम सिर्फ एक पोस्ट ऑफिस की तरह शिकायत को एक टेबल से दूसरे टेबल पर सरकाना है, या मोटर वाहन अधिनियम (Motor Vehicles Act) के तहत सड़कों को सुरक्षित और सुचारू बनाए रखना भी उनकी जिम्मेदारी है?

मुहिमों का ढोंग और जनता के पैसों की बर्बादी

प्रशासन हर कुछ महीनों में ‘नो पार्किंग वीक’ या ‘सड़क सुरक्षा अभियान’ जैसी भारी-भरकम मुहिम चलाता है, जिसपर जनता के टैक्स का करोड़ों रुपया पानी की तरह बहाया जाता है। लेकिन जब एक सजग नागरिक खुद सबूतों के साथ अवैध रूप से खड़े वाहनों की लोकेशन आरटीओ को देता है, तब यह तंत्र पूरी तरह पंगु नजर आता है। यह विरोधाभास साबित करता है कि ये मुहिम केवल सुर्खियां बटोरने के लिए हैं, धरातल पर ट्रैफिक सुधारने की कोई वास्तविक प्रशासनिक इच्छाशक्ति नहीं है।

यह कार्यशैली पर कड़ा सवाल है

यह रिपोर्ट किसी अधिकारी पर व्यक्तिगत लांछन नहीं है, बल्कि मुंबई आरटीओ और ट्रैफिक पुलिसिंग की उस पूरी ‘कमिश्नर प्रणाली’ और कार्यप्रणाली पर सीधा सवाल है जो कानून के प्रवर्तन (Law Enforcement) में पूरी तरह विफल साबित हो रही है। यदि आरटीओ और स्थानीय ट्रैफिक चौकियां इसी तरह एक-दूसरे पर जिम्मेदारी टालती रहीं, तो मलाड न्यू लिंक रोड जैसी मुख्य धमनियां कभी भी अतिक्रमण और जाम से मुक्त नहीं हो पाएंगी।

मुंबई की जनता और शिकायतकर्ता को अब “फॉरवर्डेड” के कागजी संदेशों की नहीं, बल्कि मलाड न्यू लिंक रोड से अवैध वाहनों को जब्त करने और सड़कों को खाली कराने जैसी ठोस दंडात्मक कार्रवाई की अपेक्षा है।

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