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विशेष: मुंबई आरटीओ की डिजिटल ‘मनमर्जी’; पहले आते थे जवाब, अब शिकायतों पर साधा ‘मौन’, कैसे मुक्त होगा मलाड लिंक रोड?

पारदर्शिता का दावा खोखला: डिजिटल इंडिया के दौर में नागरिकों की वैध शिकायतों को नजरअंदाज करता मुंबई आरटीओ।

ब्यूरो, मुंबई (वशिष्ठ वाणी):

डिजिटल इंडिया और पारदर्शी प्रशासन का दम भरने वाले सरकारी महकमे जमीनी हकीकत में किस कदर संवेदनहीन हो चुके हैं, इसका जीता-जागता उदाहरण मुंबई प्रादेशिक परिवहन कार्यालय (RTO) की सोशल मीडिया कार्यप्रणाली में देखने को मिल रहा है। ‘वशिष्ठ वाणी’ द्वारा मलाड न्यू लिंक रोड (Malad New Link Road) को अवैध पार्किंग और लावारिस वाहनों से मुक्त कराने के लिए लगातार चलाई जा रही मुहिम के बीच एक चौंकाने वाला प्रशासनिक रवैया सामने आया है। विभाग अब नागरिकों और मीडिया की वैध शिकायतों पर जवाब देना तो दूर, उन्हें देखना तक गँवारा नहीं कर रहा है।

पहले आता था जवाब, अब ‘मौन’: क्या आरटीओ का मन ही तय करता है कानून?

‘वशिष्ठ वाणी’ के खोजी ब्यूरो के रिकॉर्ड के अनुसार, मलाड न्यू लिंक रोड पर यातायात को बाधित करने वाले अवैध वाहनों और कबाड़ गाड़ियों के खिलाफ जब पूर्व में शिकायतें दर्ज कराई जाती थीं, तब मुंबई आरटीओ के सोशल मीडिया हैंडल (ट्विटर/X) से त्वरित या औपचारिक प्रतिक्रिया (Reply) आती थी। लेकिन अब यह सिलसिला पूरी तरह बंद हो चुका है।

अब स्थिति यह है कि आरटीओ विभाग ने शिकायतों पर पूरी तरह से मौन साध लिया है। इस रवैये को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि मुंबई आरटीओ कानून और कर्तव्य से नहीं, बल्कि अपनी ‘मनमर्जी’ से चल रहा है। यानी अगर अधिकारियों का मन होगा, तो वे जवाब देंगे और कार्रवाई करेंगे, और यदि मन नहीं हुआ, तो सजग नागरिक चाहे जितनी भी शिकायतें और साक्ष्य भेज दें, उन्हें पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया जाएगा।

जब रक्षक ही आंखें मूंद लें, तो माफियाओं के हौसले बुलंद होना लाजिमी है

मलाड न्यू लिंक रोड जैसे अतिव्यस्त मार्ग को अवैध पार्किंग से मुक्त कराने के लिए शासन स्तर पर चाहे कितने भी दावे किए जाएं या बड़ी-बड़ी ‘मुहिम’ चलाई जाएं, वे तब तक पूरी तरह नाकाम साबित होंगी जब तक कि विभाग के अधिकारी खुद संज्ञान नहीं लेना चाहेंगे। जब देश के सबसे बड़े महानगर का परिवहन विभाग ही नागरिकों की जनहित से जुड़ी आवाजों पर अपने आंख और कान बंद कर ले, तो सड़कों पर अवैध रूप से गाड़ियां खड़ी करने वाले पार्किंग माफियाओं के हौसले बुलंद होना स्वाभाविक है।

यह आरटीओ की डिजिटल जवाबदेही पर कड़ा प्रहार है

यह रिपोर्ट किसी व्यक्ति विशेष पर व्यक्तिगत लांछन नहीं है, बल्कि मुंबई आरटीओ की उस डिजिटल कार्यप्रणाली पर एक बड़ा सवालिया निशान है जो जनता के प्रति अपनी जवाबदेही से भाग रही है। जनता के टैक्स के पैसों से चलने वाले इन आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल्स का उद्देश्य नागरिकों की समस्याओं का निवारण करना है, न कि चुनिंदा शिकायतों पर चुप्पी साध कर बैठ जाना।

‘वशिष्ठ वाणी’ आरटीओ प्रशासन से यह सीधा सवाल पूछता है कि मलाड न्यू लिंक रोड के संबंध में भेजी जा रही वैध शिकायतों पर यह रहस्यमयी चुप्पी क्यों साधी गई है? मुंबई की जनता को अब आरटीओ की इस मनमर्जी और उदासीनता से मुक्ति चाहिए और सड़कों पर कागजी दावों के बजाय ठोस दंडात्मक कार्रवाई की अपेक्षा है।

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