
• लेख: अभिषेक अनिल वशिष्ठ •
(वशिष्ठ मीडिया हाउस प्राइवेट लिमिटेड के चेयरमैन एवं समूह दैनिक समाचार पत्र के स्वामी/प्रकाशक)
मुंबई की धमनियों में दौड़ती ‘स्पिरिट’ आज एक दम घुटने वाली हकीकत से जूझ रही है। शहर के फुटपाथ, जो कभी आम आदमी के चलने के लिए एक सुरक्षित आश्रय हुआ करते थे, आज वे किसी और की ‘जागीर’ बन चुके हैं। और इसे अंजाम देने वाले कौन हैं? वे ‘धर्म के व्यापारी’, जिन्होंने आस्था के नाम पर पूरे शहर के पैदल रास्तों को अपने निजी साम्राज्य में तब्दील कर दिया है।
कमिश्नर अश्विनी भिड़े जी, क्या यह ‘स्मार्ट सिटी’ की परिभाषा है?
सवाल केवल अतिक्रमण का नहीं है, सवाल उस प्रशासनिक नपुंसकता का है, जिसने कानून को इन ‘व्यापारियों’ के जूतों के नीचे डाल दिया है। फुटपाथ खत्म हुए, तो सड़क पर मंडप तन गए; सड़क कम पड़ी, तो पार्किंग के लिए फुटपाथों को बाड़ लगा दी गई। आज एक गर्भवती महिला, एक स्कूल जाता बच्चा, या एक लाठी के सहारे चलता बुजुर्ग—आखिर ये लोग अपनी जान की बाजी लगाकर सड़क के बीचों-बीच चलने को मजबूर क्यों हैं?
क्या धर्म का अर्थ सार्वजनिक अव्यवस्था है?
माना कि आस्था व्यक्तिगत है, लेकिन क्या आस्था की सीमा यह तय करती है कि सार्वजनिक रास्तों पर ‘कब्जा’ कर लिया जाए? अगर ‘धर्म के व्यापारियों’ को फुटपाथ का उपयोग करना ही है, तो नियम-कानून तो बनाए गए होंगे! क्या यह संभव नहीं था कि फुटपाथ का केवल एक हिस्सा ही इस्तेमाल किया जाता, ताकि आम जनता के आवागमन के लिए जगह बची रहे? आखिर ‘आस्था’ के नाम पर पूरे के पूरे रास्ते को ‘नो-गो ज़ोन’ में बदल देना, कहाँ का न्याय है?
प्रशासन की ‘शून्य’ कार्रवाई—क्या ‘मलाई’ का खेल जारी है?
वशिष्ठ वाणी’ द्वारा इस गंभीर समस्या को सामने लाने के बावजूद, प्रशासन ने इसे अनदेखा कर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया। हमने कानूनी नोटिस भेजे, सबूत दिए, लेकिन कार्रवाई की फाइलें शायद किसी ‘भ्रष्ट अलमारी’ में दफन हैं। यह केवल एक लापरवाही नहीं, यह जनता की सुरक्षा के साथ खेला गया एक क्रूर मज़ाक है।
अश्विनी भिड़े, इतिहास आपकी प्रशासनिक कुशलता को इस बात से नहीं याद रखेगा कि आपने कितने बड़े प्रोजेक्ट पूरे किए, बल्कि इससे याद रखेगा कि क्या एक आम मुंबईकर आपके शासन में सुरक्षित चल पा रहा था? क्या बीएमसी अब ‘धर्म के व्यापारियों’ की निजी संस्था बनकर रह गई है?
मुंबई की जनता अब और नहीं सह सकती। फुटपाथ को उसका अधिकार वापस चाहिए, और वह अधिकार ‘धर्म के व्यापारियों’ की मेहरबानी से नहीं, बल्कि कानून के डंडे से मिलना चाहिए।
याद रखिए, जिस दिन जनता का सब्र टूटा, उस दिन आपके दफ्तर की यह ‘मलाई’ की दीवारें उसे रोक नहीं पाएंगी।













