
• लेख: अभिषेक अनिल वशिष्ठ •
(वशिष्ठ मीडिया हाउस प्राइवेट लिमिटेड के चेयरमैन एवं समूह दैनिक समाचार पत्र के स्वामी/प्रकाशक)
अयोध्या का राम मंदिर मात्र एक वास्तुशिल्प का चमत्कार नहीं, बल्कि करोड़ों हिंदुओं की उस अटूट निष्ठा का प्रतीक है, जिसे उन्होंने अपनी कमाई का अंश देकर सींचा है। लेकिन आज, उसी मंदिर की दान पेटियों से उठने वाली भ्रष्टाचार की दुर्गंध ने पूरे देश की अंतरात्मा को झकझोर कर रख दिया है। जब धर्म के नाम पर ‘व्यापार’ की नींव डाली जाती है, तब मंदिर की पवित्रता और जन-विश्वास, दोनों ही दांव पर लग जाते हैं।
जांच का ‘नाटक’ और न्याय का ‘अकाल’
लगभग दो सप्ताह पूर्व, 14 जून 2026 को उत्तर प्रदेश सरकार ने राम मंदिर चढ़ावे में अनियमितताओं की जांच के लिए एक विशेष जांच दल (SIT) का गठन किया। प्रारंभिक खुलासे स्तब्ध करने वाले हैं—सीसीटीवी फुटेज के साथ सुनियोजित छेड़छाड़, दान की नकदी के रिकॉर्ड में भारी विसंगतियां और सुरक्षा मापदंडों की धज्जियां उड़ाई जाना।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि मामला उजागर हुए इतना समय बीत जाने के बाद भी FIR (प्राथमिकी) दर्ज क्यों नहीं हुई? क्या कानून की धाराएं सत्ता के गलियारों में बैठे चहेतों के सामने जाकर अपना रास्ता बदल लेती हैं? यदि यही अपराध किसी आम नागरिक या किसी विपक्ष से जुड़े संगठन ने किया होता, तो अब तक प्रवर्तन निदेशालय (ED) के छापे पड़ चुके होते और CBI की दबिश के साये में अपराधी सलाखों के पीछे होते।
एजेंसियों की चुप्पी और सत्ता का संरक्षण
यह विडंबना ही है कि जब भ्रष्टाचार की धाराएं सत्ता के संरक्षण प्राप्त ‘धर्म के व्यापारियों’ की ओर मुड़ती हैं, तो देश की तमाम बड़ी जांच एजेंसियां—ED, CBI और आयकर विभाग—गहरी ‘सुषुप्तावस्था’ में चली जाती हैं। क्या यह केवल संयोग है कि इन संदिग्धों का संबंध सीधे तौर पर सत्ताधारी दल के कद्दावर नेताओं से है?
मेरा यह स्पष्ट मत है कि किसी को दोषी ठहराने का काम न्यायालय का है, लेकिन हम कानून के ‘दोहरे मापदंड’ को कटघरे में खड़ा करने का साहस रखते हैं। जब चोर सत्ता का चहेता होता है, तो पहले ‘जांच’ की अंतहीन फाइलों का जाल बुना जाता है, ताकि साक्ष्यों को मिटाने का समय मिल सके। वहीं, जब चोर आम आदमी होता है, तो पहले सार्वजनिक अपमान और त्वरित कार्रवाई का ‘न्याय’ होता है।
धर्म के नाम पर ‘व्यवसाय’ का कुत्सित खेल
प्रभु श्री राम का जीवन ‘मर्यादा’ का प्रतीक है, न कि भ्रष्टाचार को ढंकने वाली ‘ओट’ का। जो लोग राम के नाम का इस्तेमाल अपनी विलासिता और साम्राज्य खड़ा करने के लिए कर रहे हैं, वे वास्तव में ‘धर्म के व्यापारी’ हैं। जनता ने अपनी श्रद्धा अर्पित की थी, न कि किसी निजी तिजोरी को भरने का ‘टैक्स’।
आज जनता को यह समझना होगा कि यदि वे अब भी अपनी आँखों से ‘अंध-भक्ति’ की पट्टी नहीं हटाते हैं, तो कल ये व्यापारी राम के नाम पर उनकी बची-खुची पूंजी भी हड़प लेंगे।
निष्कर्ष और मांग
मेरी माँग करती है कि:
- सार्वजनिक पारदर्शिता: SIT की अब तक की सभी रिपोर्टें सार्वजनिक की जाएं।
- तत्काल FIR: दोषियों पर तत्काल प्राथमिकी दर्ज कर उन्हें गिरफ्तार किया जाए, चाहे उनकी राजनीतिक पहुंच कितनी ही गहरी क्यों न हो।
- एजेंसियों की निष्पक्षता: ED और CBI अपनी चुप्पी तोड़ें और स्पष्ट करें कि वे इस आर्थिक अपराध पर मौन क्यों हैं।
आस्था की बलि देकर खड़ी की गई इमारतों का अंत पतन ही होता है। समय रहते यदि ‘धर्म के व्यापारियों’ को बेनकाब नहीं किया गया, तो आने वाली पीढ़ियां हमें इस ‘मौन समर्थन’ के लिए कभी माफ नहीं करेंगी।
जागिए, क्योंकि राम के नाम पर लुटने का यह सिलसिला अब और बर्दाश्त के काबिल नहीं है।














