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संपादकीय: क्या मुंबई में कानून का राज खत्म हो चुका है? रसूखदारों के आगे घुटने टेकती प्रशासनिक व्यवस्था

मुंबई के मालाड (पश्चिम) अंतर्गत एरंगळ विलेज से सामने आया पीड़ित महिला नेहा निलेश वालावलकर का मामला केवल एक नागरिक के बुनियादी अधिकारों के हनन का नहीं है। यह मायानगरी मुंबई के समूचे प्रशासनिक तंत्र की सड़न, गहरे पैठे भ्रष्टाचार और रसूखदारों-नेताओं के आगे घुटने टेकने वाली अफसरशाही का एक ज्वलंत और बेहद शर्मनाक दस्तावेज है। देश की आर्थिक राजधानी होने का दंभ भरने वाली मुंबई में जब एक मराठी महिला पिछले एक वर्ष से अपने ही घर से बाहर निकलने के बुनियादी अधिकार (राइट टू वे) के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रही हो, और न्याय की चौखट पर उसे केवल तारीखें, बहाने और अंततः जिम्मेदार अधिकारियों से सरेआम धमकियां मिल रही हों, तो यह साफ हो जाता है कि आम जनता के लिए व्यवस्था के दरवाजे पूरी तरह बंद हो चुके हैं।


• लेखअभिषेक अनिल वशिष्ठ •
(वशिष्ठ मीडिया हाउस प्राइवेट लिमिटेड के चेयरमैन एवं समूह दैनिक समाचार पत्र के स्वामी/प्रकाशक)


यह दृश्य किसी भी सभ्य समाज को विचलित करने के लिए काफी है कि जब ‘वशिष्ठ वाणी’ के लगातार खोजी पत्रकारिता और दबाव के बाद प्रशासन की कुंभकर्णी तंद्रा टूटती है, तो मौके पर पहुंचे कलेक्टरेट के अधिकारी मुख्य रास्ते पर खड़ी अवैध दीवार को ढहाने की हिम्मत नहीं दिखा पाते। इसके विपरीत, वे पीड़ित महिला को पीछे के दरवाजे से एक ऐसा संकरा और अपमानजनक रास्ता थमाकर अपनी पीठ थपथपाने लगते हैं, जहां से घर का जरूरी सामान तक अंदर जाना मुमकिन नहीं है। जनता की अदालत में आज यह सुलगता सवाल उठना लाजिमी है कि क्या उपजिलाधिकारी (डिप्टी कलेक्टर) विनायक पाडवी अपने स्वयं के परिवार के लिए ऐसे किसी संकरे रास्ते को स्वीकार करते? क्या तब तक वह अवैध दीवार जमींदोज नहीं हो चुकी होती? अपराधियों और अवैध कब्जाधारियों के सामने सरकारी अधिकारियों का हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाना यह साफ संकेत देता है कि इस पूरे खेल के पीछे मलाई का कोई बड़ा हिस्सा या स्थानीय राजनेताओं (MLA) का वरदहस्त काम कर रहा है। सूत्रों के दावे इस आशंका को और मजबूत करते हैं कि कलेक्टरेट का ही एक अधिकारी उमेश चौधरी इस पूरे अवैध साम्राज्य का असली सूत्रधार और मास्टरमाइंड है।

प्रशासनिक तानाशाही और अहंकार का सबसे घिनौना रूप तब उजागर हुआ, जब अधिकारी उमेश चौधरी ने खुद पीड़ित महिला के सामने यह कबूल किया कि उन्हें डिप्टी कलेक्टर विनायक पाडवी द्वारा ‘वशिष्ठ वाणी’ मीडिया टीम से बात न करने के सख्त निर्देश मिले हैं। पीड़ित महिला द्वारा ‘वशिष्ठ वाणी’ को दी गई यह जानकारी सीधे तौर पर लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की आवाज को दबाने, जनता के प्रति जवाबदेही से भागने और अपनी काली करतूतों पर पर्दा डालने का एक कायराना प्रयास है। सरकारी वेतन और ताकत का रसूख दिखाने वाले ये अधिकारी शायद भूल चुके हैं कि वे जनता के सेवक हैं, किसी राजनेता या भू-माफिया के निजी जागीरदार नहीं।

‘वशिष्ठ वाणी’ इस संवेदनहीनता और गुंडागर्दी के खिलाफ मूकदर्शक बनकर नहीं बैठ सकता। निष्पक्ष पत्रकारिता और जन-सरोकार के प्रति अपनी अटूट प्रतिबद्धता को दोहराते हुए हमारी लीगल टीम ने डिप्टी कलेक्टर विनायक पाडवी को आधिकारिक लीगल नोटिस थमाकर 7 दिनों का कड़ा अल्टीमेटम दे दिया है। यदि एक सप्ताह के भीतर इस पीड़ित महिला को उसका संवैधानिक मुख्य रास्ता वापस नहीं मिला, तो इस कलेक्टरेट की तानाशाही का हिसाब अब सीधे अदालत के कटघरे में होगा। मुंबई के नीति-नियंताओं और भ्रष्ट अधिकारियों को यह समझ लेना चाहिए कि जनता की आवाज और न्याय की लड़ाई को डरा-धमकाकर या मीडिया का मुंह बंद करके कभी दबाया नहीं जा सकता। ‘वशिष्ठ वाणी’ इस मराठी महिला को न्याय दिलाने और पूरे सिस्टम के इस काले चेहरे को बेनकाब करने तक अपनी यह लड़ाई जारी रखेगा।

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