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सम्पादकीय: विज्ञापन वाली ‘मित्र-पुलिस’ और मालवणी थाने की ‘अहंकारी’ हकीकत!

मुंबई: बड़े-बड़े होर्डिंग्स, चमचमाते विज्ञापन और सरकारी मंचों से जब मुंबई पुलिस की “जनता-मित्र पुलिस व्यवस्था” का ढोल पीटा जाता है, तो टैक्स भरने वाली आम जनता को लगता है कि थानों में उन्हें न्याय और सम्मान मिलेगा। लेकिन जैसे ही कोई पीड़ित मुंबई के मालवणी पुलिस थाने की दहलीज पर कदम रखता है, उसका यह मुगालता किसी शीशे की तरह चकनाचूर हो जाता है। सरकारी दावों और जमीनी सच्चाई का यह फासला चीख-चीखकर पूछ रहा है कि मालवणी पुलिस का असल मकसद जनता की सेवा करना है या अपनी खाकी का रौब दिखाकर उन्हें सरेआम अपमानित करना?


• लेखअभिषेक अनिल वशिष्ठ •
(वशिष्ठ मीडिया हाउस प्राइवेट लिमिटेड के चेयरमैन एवं समूह दैनिक समाचार पत्र के स्वामी/प्रकाशक)


हाल ही में मालवणी पुलिस थाने से इंसानियत को शर्मसार करने वाला एक बेहद गंभीर मामला सामने आया है। आरोप है कि पुलिस उपनिरीक्षक श्रद्धा खरे ने एक ऐसे लाचार परिवार पर अपने पद और वर्दी की धौंस जमाई, जो अपनी बुजुर्ग महिला की मृत्यु के गहरे शोक में डूबा हुआ था। जिस वक्त उस दुखी परिवार को पुलिस से सहानुभूति और सहयोग की सबसे ज्यादा जरूरत थी, उस वक्त कानून की रखवाली मैडम ने उन्हें अपनी ऊंची आवाज, अहंकार और घोर बदतमीजी का शिकार बना डाला। सवाल यह उठता है कि क्या दुखी और पीड़ित नागरिकों के साथ ऐसा बर्ताव करना ही मुंबई पुलिस की नई कार्यशैली है?


वैसे, मालवणी पुलिस थाने का यह रवैया नया नहीं है, बल्कि यह इस महकमे की परंपरा बनता जा रहा है। अतीत के पन्नों को पलटें, तो अमृता देशमुख का NC मामला आज भी पुलिसिया मुस्तैदी का मज़ाक उड़ा रहा है। एक साधारण सी गैर-संज्ञेय शिकायत (NC) दर्ज करने में इस थाने को पूरे तीन महीने का लंबा वक्त लग गया। संसद वाणी और वशिष्ठ वाणी ने लगातार इस गंभीर सुस्ती पर सवाल दागे कि आखिर किसके राजनीतिक या प्रशासनिक दबाव में उस फाइल को दबाकर रखा गया था? लेकिन अफ़सोस, इस बहरे सिस्टम से आज तक कोई जवाब नहीं मिला।


इस पूरे थाने के मुखिया और वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक शैलेन्द्र नगरकर की कार्यप्रणाली पर भी स्थानीय लोगों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का गुस्सा सातवें आसमान पर है। आरोप है कि वरिष्ठ अधिकारी के पास शिकायतें सिर्फ कागजी वजन बढ़ाने के लिए जाती हैं। पीड़ित अपनी गुहार लगाते रहते हैं और साहब उसे एक कान से सुनकर दूसरे कान से हवा में उड़ा देते हैं। जब मुखिया ही आंखें मूंद ले, तो जूनियर्स की तानाशाही पर लगाम लगाएगा कौन?

सुलगते सवाल: आखिर इस शहंशाहियत पर हंटर चलाएगा कौन?

  • क्या मालवणी पुलिस प्रशासन में इतनी हिम्मत और निष्पक्षता बची है कि वह अपने ही दागी अधिकारियों के खिलाफ कोई पारदर्शी जांच बिठा सके?
  • क्या वरिष्ठ पुलिस अधिकारी अपने ही महकमे के इन ‘लाड़लों’ पर कोई कठोर दंडात्मक कार्रवाई करेंगे या फिर श्रद्धा खरे के इस मामले को भी पुरानी फाइलों की तरह ठंडे बस्ते के हवाले कर दिया जाएगा?

असल हकीकत यह है कि खाकी का रिमोट कंट्रोल अब आम जनता के हाथों से छिनकर स्थानीय रसूखदारों और राजनीतिक आकाओं के ड्राइंग रूम तक पहुंच चुका है। आम आदमी की सिसकियों से ज्यादा वजन ‘ऊपर’ से आने वाले एक फोन कॉल का होता है। नेताओं की जी-हुज़ूरी करने वाले अधिकारियों को मलाईदार पोस्टिंग और सुरक्षा का ‘कवच’ मिल जाता है, यही वजह है कि मीडिया में छपने वाली जनता की चीखें इन बंद कमरों तक नहीं पहुंच पातीं। कुछ अधिकारियों ने तो मान लिया है कि मीडिया चाहे कितने भी पन्ने काले कर ले, वे सिर्फ वही करेंगे जो उनके आका तय करेंगे।

अगर पुलिस थानों का यही हाल रहा, तो वे सुरक्षा के केंद्र नहीं बल्कि आम नागरिकों के लिए भय और मानसिक प्रताड़ना के केंद्र बन जाएंगे।


मुंबई पुलिस आयुक्त देवेन्द्र भारती जी, मालवणी पुलिस थाने से आ रही ये खबरें आपकी साख पर एक गहरा बट्टा लगा रही हैं। अब आपको यह साफ करना होगा कि मुंबई में कानून का राज चलेगा या फिर अधिकारियों की इस ‘बदतमीजी और तानाशाही’ को ही महकमे की अघोषित नीति मान लिया जाए?


याद रहे: लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा तब पैदा होता है, जब आम जनता न्याय की उम्मीद खोकर थानों की चौखट पर जाना ही छोड़ देती है।

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