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संपादकीय: लोकतंत्र का बदलता स्वरूप और ‘सवालों’ पर पहरा

लोकतंत्र की बुनियाद संवाद और जवाबदेही पर टिकी होती है। लेकिन पिछले एक दशक, विशेषकर 2014 के बाद के भारत में, सत्ता और प्रशासन के चरित्र में एक बुनियादी बदलाव महसूस किया जा रहा है। वह समय अब बीता हुआ सा लगता है जब अखबार की एक सुर्खी किसी अधिकारी की रातों की नींद उड़ा देती थी या पुलिस महकमे में हड़कंप मच जाता था। आज की कड़वी सच्चाई यह है कि खबरों का छपना अब केवल एक सूचना बनकर रह गया है; शासन-प्रशासन पर इसका नैतिक दबाव लगभग शून्य हो चुका है।

जवाबदेही का बढ़ता अभाव

एक समय था जब मीडिया को ‘लोकतंत्र का चौथा स्तंभ’ कहा जाता था और इसकी पैनी नजर से भ्रष्ट अधिकारी भी थर्राते थे। मगर आज स्थिति इसके उलट है। प्रशासनिक तंत्र में यह धारणा घर कर गई है कि जब तक शीर्ष नेतृत्व का वरदहस्त प्राप्त है, तब तक जनभावनाओं या मीडिया की रिपोर्टिंग से कोई फर्क नहीं पड़ता। पुलिस और प्रशासन की यह ‘बेफिक्री’ इस बात का प्रमाण है कि संस्थागत जवाबदेही अब व्यक्तिगत निष्ठा में तब्दील हो चुकी है।


• लेखअभिषेक अनिल वशिष्ठ •
(वशिष्ठ मीडिया हाउस प्राइवेट लिमिटेड के चेयरमैन एवं समूह दैनिक समाचार पत्र के स्वामी/प्रकाशक)


भय का नया मनोविज्ञान

सबसे चिंताजनक पहलू वह माहौल है, जिसने जनता और सत्ता के बीच के संतुलन को बिगाड़ दिया है। पहले अपराधी कानून से डरते थे, आज सवाल पूछने वाला नागरिक डरता है। एक ऐसा तंत्र विकसित कर दिया गया है जहाँ केंद्र के किसी ताकतवर मंत्री या नीति पर उंगली उठाना ‘जोखिम’ का काम बन गया है। आम नागरिक के मन में यह आशंका घर कर गई है कि यदि उसने सच बोलने का साहस किया, तो उसे किसी न किसी झूठे मुकदमे या कानूनी पेचीदगियों में उलझा दिया जाएगा।

“लोकतंत्र की सेहत के लिए सत्ता का डरना जरूरी है, लेकिन यहाँ जनता ही खौफ के साये में है।”

विपक्ष और जांच एजेंसियों का साया

लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका एक ‘वॉचडॉग’ की होती है। लेकिन वर्तमान परिदृश्य में विपक्ष के कंठ को भी रणनीतिक रूप से दबाया जा रहा है। आज विपक्षी नेताओं के बीच मुद्दों पर चिल्लाने या विरोध करने से ज्यादा इस बात का डर बना रहता है कि कहीं उनके घर के बाहर ED (प्रवर्तन निदेशालय) या आयकर विभाग की गाड़ियां न खड़ी हो जाएं। जांच एजेंसियों का जिस तरह से राजनीतिक औजार के रूप में इस्तेमाल होने का नैरेटिव बना है, उसने स्वस्थ राजनीतिक बहस के रास्ते बंद कर दिए हैं।

निष्कर्ष

जब सवाल पूछने वाली आवाजों में कंपन होने लगे और सत्ता की आलोचना करना ‘देशद्रोह’ या ‘मुसीबत’ का पर्याय बन जाए, तो समझ लेना चाहिए कि लोकतंत्र गहरे संकट में है। संस्थानों की स्वायत्तता और मीडिया का प्रभाव बहाल करना केवल प्रेस की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे समाज की जरूरत है। अगर प्रशासन और पुलिस खबरों से बेखौफ हो जाएं और जनता सत्ता से डरने लगे, तो वह ‘न्यू इंडिया’ का नहीं, बल्कि एक कमजोर लोकतंत्र का संकेत है।

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