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CMO Maharashtra का सोशल मीडिया सिर्फ ‘दिखावा’? ट्वीट पर आने वाली शिकायतों पर सन्नाटा, केवल पीएम मोदी की तारीफों में व्यस्त!

मुंबई: डिजिटल इंडिया और पारदर्शी शासन के बड़े-बड़े दावों के बीच महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO Maharashtra) के आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल्स को लेकर एक बड़ा और गंभीर सवाल खड़ा हो गया है। जनता और मीडिया समूहों द्वारा अपनी ज़मीनी समस्याओं को लेकर ट्विटर/X पर @CMOMaharashtra को टैग करके लगातार शिकायतें दर्ज कराई जा रही हैं। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि आज तक इन डिजिटल शिकायतों पर न तो कोई ठोस कार्रवाई हुई है और न ही किसी विषय पर कोई आधिकारिक जवाब आया है।

आखिर मुख्यमंत्री कार्यालय के नाम पर बने इन अकाउंट्स का असली मकसद क्या है? क्या ये सिर्फ ‘दिल्ली दरबार’ को खुश करने और जनता को गुमराह करने का जरिया बनकर रह गए हैं?

ग्राउंड जीरो का बड़ा सच: “मुख्यमंत्री से शिकायत करेंगे…” अब सिर्फ एक मजाक!

अक्सर स्थानीय स्तर पर जब भ्रष्ट अधिकारी कार्रवाई नहीं करते, तो पीड़ित जनता कहती है कि “हम मुख्यमंत्री से आपकी शिकायत करेंगे।” लेकिन आज का कड़वा सच यह है कि मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO Maharashtra) से शिकायत करना महज एक औपचारिकता बनकर रह गया है।

  • सोशल मीडिया पर सिर्फ ‘तारीफों के पुल’: मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO) के आधिकारिक ट्विटर/X अकाउंट पर दिन-रात केवल सरकार की अपनी पीठ थपथपाने वाली पोस्ट या फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफों के कसीदे पढ़े जाते हैं। धरातल पर जनता जिन समस्याओं (जैसे मालवणी का ब्लॉक आपातकालीन रास्ता) से जूझ रही है, उस पर न कोई जवाब आता है और न ही कोई ठोस कार्रवाई होती है।
  • क्यों नहीं बनती CMO की स्पेशल टास्क फोर्स?: अगर सरकार वाकई जनता के प्रति गंभीर होती, तो सोशल मीडिया और डिजिटल माध्यमों से आने वाली इन गंभीर शिकायतों के लिए एक ‘स्पेशल टीम’ या टास्क फोर्स बनाई जाती, जो सीधे ऑन-स्पॉट जांच कर लापरवाह अधिकारियों को सस्पेंड करती। लेकिन यहाँ तो शिकायतों को रद्दी की टोकरी में डाल दिया जाता है।

नेताओं को जनता की चिंता क्यों हो? जब ‘दिल्ली’ से तय होते हैं मुख्यमंत्री!

आज की राजनीति में यह धारणा मजबूत हो चुकी है कि नेताओं को अब जनता के सुख-दुख या उनके वोटों की परवाह नहीं रह गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाले मौजूदा राजनीतिक दौर में नेताओं को यह अच्छे से समझ आ चुका है कि:

“आप जनता का भला करें या न करें, जमीनी काम हो या न हो, इससे कोई खास फर्क नहीं पड़ता। अगर ‘दिल्ली’ (हाईकमान) का दिल आ गया, तो किसी को भी मुख्यमंत्री या मंत्री की कुर्सी पर बैठा दिया जाएगा। यही वजह है कि राज्य के नेता दिन-रात जनता की समस्याओं को सुलझाने के बजाय इस चिंता में डूबे रहते हैं कि ऐसा क्या किया जाए जिससे ‘दिल्ली के आका’ खुश रहें।”


वशिष्ठ वाणी का तीखा प्रहार

“अगर सरकार वाकई डिजिटल गवर्नेंस को लेकर गंभीर है, तो मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO) के स्तर पर एक ऐसी स्पेशल टास्क फोर्स या टीम क्यों नहीं बनाई जाती जो सोशल मीडिया पर आने वाली शिकायतों का ऑन-स्पॉट संज्ञान लेकर लापरवाह अधिकारियों पर हंटर चलाए? मुख्यमंत्री जी, सोशल मीडिया पर सिर्फ चमक-दमक दिखाने और तारीफों के पुल बांधने से महाराष्ट्र की जनता का भला नहीं होने वाला। ट्विटर पर अकाउंट सिर्फ पीआर (PR) के लिए नहीं, बल्कि जनता की समस्याओं को सुनने के लिए होना चाहिए!”

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