Rekha Gupta Vs Arvind Kejriwal: अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया को कोर्ट से राहत मिलने के बाद दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। शराब नीति, डेटा डिलीशन, शीशमहल और कथित घोटालों को लेकर उन्होंने कई गंभीर सवाल उठाए हैं, जिससे दिल्ली की राजनीति में नया विवाद खड़ा हो गया है।
दिल्ली की राजनीति एक बार फिर गर्म हो गई है। मुख्यमंत्री Rekha Gupta ने अदालत द्वारा Arvind Kejriwal और Manish Sisodia को राहत दिए जाने के बाद तीखा बयान जारी किया है।
उन्होंने कहा —
👉 “आज वह जितने घड़ियाल आंसू दिखा रहे हैं और कट्टर ईमानदारी की बात कर रहे हैं, उससे पहले कई सवालों का जवाब देना होगा।”
🔎 डेटा और शराब नीति पर सवाल
मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने आरोप लगाते हुए कहा कि जब यह पूरा मामला सामने आया, तब सबूतों के साथ छेड़छाड़ की गई।
उनका दावा था कि:
- करीब 150 मोबाइल फोन का डेटा हटाया गया
- जांच शुरू होते ही शराब नीति को वापस ले लिया गया
उन्होंने सवाल उठाया:
➡️ अगर नीति सही थी, तो जांच शुरू होते ही उसे वापस क्यों लिया गया?
➡️ दिल्ली में “एक पर एक मुफ्त” शराब की योजना क्यों लाई गई?
🏢 प्राइवेटाइजेशन और कमीशन पर आरोप
रेखा गुप्ता ने यह भी कहा कि शराब सेक्टर को निजीकरण की दिशा में ले जाने का प्रयास किया गया और कमीशन को 5% से बढ़ाकर 12% करने की बात सामने आई।
उन्होंने दावा किया कि इस पूरी प्रक्रिया में कथित आर्थिक लाभ की झलक दिखाई देती थी और उस समय उच्च न्यायालय ने भी इस पर चिंता जताई थी।
🏠 ‘शीशमहल’ और विकास पर राजनीतिक हमला
मुख्यमंत्री का हमला यहीं नहीं रुका।
उन्होंने कहा:
- दिल्ली के विकास के नाम पर बड़े स्तर पर खर्च हुआ
- ‘शीशमहल’ निर्माण को लेकर जनता के साथ विश्वासघात हुआ
- शिक्षा और इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं पर भी सवाल उठे
उन्होंने कटाक्ष करते हुए कहा कि:
👉 जो स्वयं को साधारण और ईमानदार बताते हैं, उन्हें यह स्पष्ट करना चाहिए कि पिछले 11 वर्षों में राजधानी के लिए ठोस उपलब्धियां क्या रहीं।
⚖️ राजनीतिक टकराव का नया दौर
यह बयान ऐसे समय आया है जब अदालत से राहत मिलने के बाद आम आदमी पार्टी अपनी राजनीतिक नैतिकता को लेकर आक्रामक रुख अपना रही है।
दूसरी ओर, मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता के इन आरोपों ने यह संकेत दिया है कि दिल्ली की राजनीति अब कानूनी फैसलों से आगे बढ़कर नैरेटिव की लड़ाई में प्रवेश कर चुकी है।
🧭 निष्कर्ष
अदालत का फैसला कानूनी राहत जरूर लेकर आया है, लेकिन राजनीतिक बहस थमी नहीं है।
अब मुख्य सवाल यह है:
👉 क्या यह मामला अदालत से निकलकर जनमत की अदालत में पहुंच चुका है?
👉 और क्या आने वाले समय में यह मुद्दा दिल्ली की राजनीति का केंद्र बनेगा?














