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स्कूल की किताबों में शामिल होंगे ‘लाडू’, ‘रोटलो’, ‘मोटो बापो’ जैसे शब्द, राजस्थान में स्थानीय बोली में होगी पढ़ाई

राजस्थान के स्कूली बच्चे किताबों में ‘लाडू’, ‘रोटलो’ और ‘मोटो बापो’ जैसे शब्द पढ़ेंगे. सरकारी स्कूलों में से स्थानीय शब्दों को शामिल किया जाएगा. शिक्षा विभाग ने राजस्थान में बहुभाषी शिक्षा परियोजना शुरू की है, जिसके तहत बच्चों को उनकी स्थानीय भाषा में पढ़ाया जाएगा. इस परियोजना को फिलहाल राज्य के 11 जिलों में लागू करने की योजना है, फिर इसे चरणबद्ध रूप से पूरे प्रदेश में लागू किया जाएगा. यह परियोजना संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (यूनिसेफ), ‘रूम टू रीड’ और ‘लैंग्वेज एंड लर्निंग फाउंडेशन’ के सहयोग से संचालित की जा रही है.

2 चरणों में किया गया सर्वे

राजस्थान राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (आरएससीईआरटी) की निदेशक श्वेता फगेड़िया ने बताया कि शिक्षा में भाषायी अंतर को समझने के लिए दो चरण में बोलियों का सर्वेक्षण कराया था. उन्होंने बताया कि विद्यालयों की सामाजिक भाषायी गतिशीलता को समझना और घर-स्कूल के वातावरण के बीच भाषायी असमानताओं के कारण शिक्षा में पैदा होने वाली बाधाओं का आकंलन किया गया. 

सबसे अधिक बोली जाती है मेवाड़ी और वागड़ी 

पहले चरण में नौ जिलों प्रतापगढ़, बांसवाड़ा, डूंगरपुर, चित्तौडगढ़़, राजसमंद, पाली, सिरोही और उदयपुर में सर्वे किया गया. इसमें 20 हजार 298 स्कूलों के पहली कक्षा को पढ़ाने वाले शिक्षकों को शामिल किया गया. सर्वेक्षण में इन जिलों में बोली जाने वाली 31 से अधिक बोलियों की पहचान की गई. इसमें सामने आया कि वागड़ी और मेवाड़ी विद्यार्थियों द्वारा सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है.

दूसरे चरण में 24 जिलों में एक व्यापक सर्वेक्षण किया गया. इस सर्वेक्षण के लिए डेटा इन जिलों में कक्षा एक को हिंदी भाषा पढ़ाने वाले शिक्षकों ने भरा. सर्वेक्षण में इन जिलों के 250 खंड में 41 हजार 686 विद्यालयों के कक्षा एक में पढ़ने वाले 3,66,782 विद्यार्थियों को शामिल किया गया.

योजना के लिए ऐसे हुआ सर्वे 

आरएससीईआरटी ने प्रयोग के लिए डूंगरपुर और सिरोही का चयन किया. क्योंकि इन जिलों में भाषायी विविधता सर्वाधिक तथा घरेलू भाषा और विद्यालय की भाषा के बीच अंतर अधिक है. शुरुआत में बहुभाषी शिक्षा कार्यक्रम सिरोही जिले के आबूरोड ब्लॉक और डूंगरपुर जिले के बिछीवाड़ा ब्लॉक के 200 विद्यालयों में लागू किया. पहले साल कक्षा-1 और दूसरे साल कक्षा-2 के विद्यार्थियों को स्थानीय भाषा में पढ़ाया गया. सिरोही और डूंगरपुर के विद्यालयों में वागड़ी और गरासिया समुदाय की मातृभाषा के शब्दों का इस्तेमाल किया गया. इसे पढ़ाए जाने से पढ़ाई में बच्चों की रुचि और समझ दोनों बढ़ी.

स्थानीय बोली से आसान हुई पढ़ाई

वागड़ी बोली के ‘पाणी’, ‘बापू’, ‘घरो’, ‘छोकरो’, ‘आवो’ और ‘रोटली’ जैसे शब्दों और गरासिया बोली के आई (मां), बापो (पिता), मितर (दोस्त) जैसे शब्दों को शिक्षण में शामिल किया गया. इससे बच्चों के लिए पढ़ाई अधिक सहज हो गयी है.

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