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फिर तारीख मिली… क्योंकि म्हाडा के रत्न बी.एस. कटरे नदारत रहे!

10 मार्च की सुनवाई में फिर खाली रही कुर्सी, मंत्रालय की कार्यप्रणाली पर उठे सवाल

मुंबई/वशिष्ठ वाणी: म्हाडा की सुनवाई व्यवस्था एक बार फिर सवालों के घेरे में आ गई है। सोसाइटी से जुड़े एक मामले की सुनवाई के लिए 10 मार्च को दोपहर 3 बजे का समय तय किया गया था। इस तारीख को लेकर संबंधित पक्षकार समय पर म्हाडा कार्यालय पहुंचे, लेकिन वहां पहुंचने के बाद जो स्थिति सामने आई, उसने एक बार फिर प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए।

दरअसल, जिस अधिकारी ने यह सुनवाई की तारीख तय की थी — म्हाडा के अधिकारी बी.एस. कटरे — वही उस दिन सुनवाई में उपस्थित नहीं थे। बताया जा रहा है कि यह पहली बार नहीं है जब तय तारीख पर सुनवाई के दौरान अधिकारी नदारत रहे हों। इससे पहले भी कई बार ऐसी स्थिति बन चुकी है, जब सुनवाई की तारीख तय हुई, लोग पहुंचे, लेकिन सुनवाई करने वाला अधिकारी मौजूद नहीं मिला।

सबसे हैरानी की बात यह है कि 10 मार्च की सुनवाई रद्द होने की कोई पूर्व सूचना किसी को नहीं दी गई। न तो फोन के माध्यम से, न ही किसी आधिकारिक संदेश के जरिए यह बताया गया कि सुनवाई नहीं होगी। जब संबंधित लोग म्हाडा कार्यालय पहुंचे, तब उन्हें बताया गया कि “आज साहेब नहीं आए हैं, इसलिए आपको अगली तारीख दी जाएगी।”

ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या प्रशासनिक व्यवस्था का मतलब यही है कि लोग दूर-दराज़ से समय और पैसा खर्च कर दफ्तर तक पहुंचें और फिर उन्हें केवल अगली तारीख का कागज पकड़ा दिया जाए? कई लोगों का कहना है कि अगर पहले से सूचना दे दी जाती तो उनका समय और पैसा दोनों बच सकते थे।

म्हाडा की इस कार्यप्रणाली को लेकर अब प्रशासनिक गलियारों में भी चर्चा तेज हो गई है। यह भी कहा जा रहा है कि संबंधित अधिकारी बी.एस. कटरे को मंत्रालय के कुछ प्रभावशाली लोगों का समर्थन प्राप्त है, जिसकी वजह से बार-बार ऐसी घटनाएं होने के बावजूद भी कोई ठोस कार्रवाई या जवाबदेही तय होती दिखाई नहीं देती।

अब सवाल सीधे मंत्रालय से पूछा जा रहा है कि क्या म्हाडा जैसी महत्वपूर्ण संस्था में सुनवाई की पूरी व्यवस्था केवल एक ही अधिकारी पर निर्भर है? क्या मंत्रालय के पास कोई दूसरा अधिकारी नहीं है जो ऐसी स्थिति में सुनवाई की जिम्मेदारी संभाल सके? और अगर बार-बार सुनवाई तय करने वाला अधिकारी खुद ही अनुपस्थित रहता है, तो उसकी जवाबदेही कौन तय करेगा?

सुनवाई के लिए आने वाले लोगों का कहना है कि वे केवल पास के इलाके से नहीं बल्कि कई बार दूर-दूर से आते हैं। इसके लिए उन्हें काम से छुट्टी लेनी पड़ती है, यात्रा का खर्च उठाना पड़ता है और कई उम्मीदों के साथ वे सुनवाई में शामिल होने पहुंचते हैं। लेकिन जब सुनवाई की कुर्सी खाली मिलती है तो उनके मन में यही सवाल उठता है कि क्या आम नागरिक का समय प्रशासन के लिए कोई मायने नहीं रखता?

म्हाडा की सुनवाई व्यवस्था पर उठते इन सवालों का जवाब अब देना ही होगा। क्योंकि न्याय केवल तारीख देने से नहीं मिलता, बल्कि समय पर सुनवाई और जिम्मेदारी निभाने से मिलता है। अगर बार-बार यही स्थिति बनी रही कि तारीख तय हो, जनता पहुंचे और अधिकारी गायब मिलें, तो फिर यह व्यवस्था न्याय से ज्यादा औपचारिकता बनकर रह जाएगी।

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