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डॉक्टरों को ‘ठंडी हवा’, मरीजों को ‘गर्मी की सजा’! अमेठी के शाहमऊ स्वास्थ्य केंद्र की बदहाली पर उठे बड़े सवाल; ‘शोपीस’ बने पंखे

अमेठी (विशेष ब्यूरो): यूपी के अमेठी में स्वास्थ्य व्यवस्थाओं के बड़े-बड़े दावों की पोल एक बार फिर खुल गई है। तिलोई विकासखंड क्षेत्र का बहुचर्चित प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC) शाहमऊ इन दिनों अपनी चरमराई अव्यवस्थाओं को लेकर सुर्खियों में है। ग्रामीण इलाकों में बेहतर इलाज का दम भरने वाले इस केंद्र में मरीजों को इलाज मिलना तो दूर, मूलभूत सुविधाओं के लिए भी तड़पना पड़ रहा है। हालात यह हैं कि जहां जिम्मेदार सिस्टम बैठता है, वहां तो सुख-सुविधाएं हैं, लेकिन जो जनता टैक्स देती है, वह इस भीषण गर्मी में नरक झेलने को मजबूर है।

डॉक्टरों के केबिन में डबल पंखे, प्रतीक्षालय में मरीज बेहाल

शाहमऊ प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के भीतर का नज़ारा बेहद चौंकाने वाला और संवेदनहीन है। अस्पताल के जिस हिस्से में डॉक्टर और स्वास्थ्य कर्मी बैठते हैं, वहां आराम से दो-दो पंखे चल रहे हैं। इसके विपरीत, जहां दूर-दराज के गांवों से आए बीमार मरीज और बुजुर्ग घंटों लाइन में खड़े रहते हैं, उस प्रतीक्षालय (Waiting Area) के पंखे सिर्फ ‘शोपीस’ बनकर लटक रहे हैं। इस भीषण गर्मी और उमस में मरीज और उनके तीमारदार पसीने से लथपथ होकर अपनी बारी का इंतज़ार करने को मजबूर हैं।

पीने के पानी का संकट: ‘टुल्लू पंप’ के भरोसे चल रहा है अस्पताल!

ग्रामीणों का आरोप है कि अस्पताल प्रशासन खर्च बचाने के नाम पर मरीजों की जान और सहूलियत से खिलवाड़ कर रहा है। अस्पताल में लंबे समय से पेयजल संकट बना हुआ है। पहले से लगे समरसेबल पंप को ठीक कराने के बजाय, जुगाड़ तंत्र का इस्तेमाल करते हुए टुल्लू मोटर लगा दी गई है। नल की स्थिति यह है कि उसका ऊपरी हिस्सा प्राइवेट और निचला हिस्सा इंडिया मार्का का है। पानी निकालने के लिए पहले आधे घंटे तक उसमें ऊपर से पानी डालना पड़ता है। ऐसे में बीमार मरीजों को प्यास बुझाने के लिए अस्पताल परिसर से बाहर भटकना पड़ रहा है।

दूसरों को बीमारी से बचने की सलाह देने वाला खुद ‘बीमार’

एक तरफ स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारी गांव-गांव जाकर लोगों को जलभराव न होने देने और डेंगू-मलेरिया जैसी संक्रामक बीमारियों से बचाव की नसीहत देते हैं। वहीं दूसरी ओर, शाहमऊ स्वास्थ्य केंद्र का अपना परिसर खुद जलभराव के दलदल में डूबा हुआ है। अस्पताल परिसर में जमा गंदा पानी मच्छरों के पनपने का सबसे सुरक्षित ठिकाना बन चुका है। जो मरीज यहाँ इलाज कराने आ रहे हैं, उन्हें यहाँ से डेंगू और मलेरिया का संक्रमण मिलने का खतरा सता रहा है।

शिकायतें फाइलों में दफन, एसी कमरों से बाहर नहीं निकलते अधिकारी

स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि इस बदहाली के खिलाफ कई बार जिम्मेदार उच्च अधिकारियों को लिखित और मौखिक शिकायतें भेजी जा चुकी हैं। लेकिन नतीजा हमेशा ‘ढाक के तीन पात’ ही रहा। शिकायतें सिर्फ सरकारी फाइलों में दफन होकर रह जाती हैं। जिम्मेदार अधिकारी कभी ग्राउंड जीरो पर आकर वास्तविक स्थिति देखने की जहमत नहीं उठाते।

‘वशिष्ठ वाणी’ का तीखा सवाल: आखिर जब सरकारी अस्पतालों में आने वाले गरीब मरीजों के लिए एक पंखा तक नहीं चल सकता और पीने का साफ पानी नहीं मिल सकता, तो सरकार और स्वास्थ्य विभाग के ये बड़े-बड़े दावे और करोड़ों का बजट किसके लिए है? इस लापरवाही पर सीएमओ (CMO) और जिले के प्रशासनिक आला अफसर कब एक्शन लेंगे?

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