सवालों के घेरे में व्यवस्था: ‘वशिष्ठ वाणी’ के खुलासे के बाद भी स्थानीय रसूखदारों और अफ़सरशाही का मौन बरकरार।
ब्यूरो, मुंबई (वाशिष्ठ वाणी): “कुर्सी मिलते ही लोक सेवकों और नेताओं की प्राथमिकताएं बदल जाती हैं”—’वशिष्ठ वाणी’ द्वारा कल उठाए गए इस कड़वे सच पर आज प्रशासनिक व्यवस्था की चुप्पी ने खुद अपनी मुहर लगा दी है। मुंबई के फुटपाथों और सड़कों को अवैध मंडपों और पार्किंग से ब्लॉक किए जाने के महा-खुलासे के २४ घंटे बाद भी अब तक कोई ठोस जमीनी कार्रवाई नहीं हुई है।
इस बेशरम चुप्पी और ‘धर्म के व्यापारियों’ द्वारा किए गए कब्जों के बाद अब मुंबई की पीड़ित जनता सीधे स्थानीय स्तर पर राजनीति चमकाने वाले नेताओं और संबंधित विभाग के अधिकारियों से एक बुनियादी और तीखा सवाल पूछ रही है—“जब नियम-कानूनों को ताक पर रखकर फुटपाथों को पूरी तरह बंद कर दिया गया है, मंडपों के बगल में गाड़ियां पार्क हैं, तो आम जनता, महिलाएं और बुजुर्ग सड़क पर कहाँ से जाएंगे? क्या जनता हवा में उड़कर जाएगी?”
रितु तावड़े जी, ‘धर्म के व्यापारियों’ के इस कब्जे पर आपकी चुप्पी क्यों?
‘वशिष्ठ वाणी’ इस रिपोर्ट के माध्यम से मुंबई की स्थानीय राजनीति का चर्चित चेहरा रितु तावड़े से भी सीधे और कड़े सवाल पूछती है। त्योहारों की आड़ में जिस तरह आम नागरिकों के ‘चलने के अधिकार’ को छीना जा रहा है, क्या वह आपको दिखाई नहीं देता? फुटपाथ से लेकर आधी सड़कों तक को घेरकर जो मंडप और वाहनों का डेथ-ट्रैप (मौत का कुआं) बनाया गया है, उसपर आपकी तरफ से कोई विरोध या कार्रवाई की मांग क्यों नहीं उठी?
हमें पूरा यकीन है कि इस खबर के बाद भी स्थानीय रसूखदार नेताओं और विभाग द्वारा कोई ठोस कार्रवाई नहीं की जाएगी। ऐसा इसलिए क्योंकि आज के इस स्वार्थी सिस्टम में आम जनता की सुरक्षा और उनकी दिक्कतों की फिक्र शायद किसी को नहीं है। चुनाव बीतते ही जनता सिर्फ एक वोट बैंक बनकर रह जाती है।
‘वशिष्ठ वाणी’ अपना कर्तव्य निभाती रहेगी
नेता चुप रहें या अधिकारी आंखें मूंद लें, लेकिन ‘वशिष्ठ वाणी’ और ‘वशिष्ठ मीडिया हाउस’ पूरी निष्ठा के साथ अपने पत्रकारिता के कर्तव्य को निभाता रहेगा। हम जनता की सुरक्षा और उनके अधिकारों से जुड़े इस मुद्दे को तब तक उठाते रहेंगे जब तक कि इस बहरे सिस्टम को हमारी आवाज सुनाई नहीं दे जाती।
बॉम्बे हाई कोर्ट ने साफ कहा है कि फुटपाथ पर चलना नागरिकों का मौलिक अधिकार (Article 21) है। कोर्ट के ५०% के नियम की धज्जियां उड़ाने वाले इन अवैध कब्जों की रिपोर्ट और अधिकारियों व नेताओं की इस निष्क्रियता के ताज़ा सबूतों को हमारी लीगल टीम सीधे लोकायुक्त और बॉम्बे हाई कोर्ट के समक्ष ‘अदालत की अवमानना’ (Contempt of Court) के तहत पेश करने की तैयारी कर रही है। लोकतंत्र में जनता का रास्ता रोकने की छूट किसी को नहीं दी जा सकती।













