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संपादकीय: क्या अब BJP-RSS के इशारे पर ही चलेगा पूरा हिंदुस्तान?

देश के नाम एक खुला पत्र

• लेखअभिषेक अनिल वशिष्ठ •
(वशिष्ठ मीडिया हाउस प्राइवेट लिमिटेड के चेयरमैन एवं समूह दैनिक समाचार पत्र के स्वामी/प्रकाशक)


साल 2014 का वह मंजर याद कीजिए, जब पूरे भारत में एक नई लहर थी। हर नागरिक की आँखों में एक उम्मीद थी कि अब देश विकास की नई इबारत लिखेगा, भ्रष्टाचार का खात्मा होगा और एक ऐसा नेतृत्व हमें मिलेगा जो जनता के प्रति जवाबदेह होगा। आज एक दशक से अधिक का समय बीत चुका है। सवाल यह है—क्या वह उम्मीद पूरी हुई? या फिर आज हम एक ऐसे दौर में हैं जहाँ सच बोलने की कीमत चुकानी पड़ती है?

‘ना खाऊंगा, ना खाने दूंगा’—क्या सिर्फ एक चुनावी जुमला था?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस चर्चित नारे—’ना खाऊंगा, ना खाने दूंगा’—ने देश को एक सुरक्षा का एहसास दिया था। लेकिन आज, जब अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावे की चोरी जैसी शर्मनाक घटनाएँ सामने आती हैं, तो सत्ता का मौन चुभता है। जिन लोगों ने मंदिर निर्माण का श्रेय लेने के लिए पूरे देश को साथ जोड़ा था, आज वही लोग उस मंदिर में हुई धांधली पर चुप्पी साधे हुए हैं। क्या भगवान के दरबार में भ्रष्टाचार का होना हमें शर्मसार नहीं करता? और सबसे बड़ा सवाल यह कि इन दोषियों को सजा दिलाने के बजाय, उन्हें बचाने का यह कैसा खेल चल रहा है?

डर का लोकतंत्र: सवाल पूछना अब ‘गुनाह’ है?

आज भारतीय राजनीति का माहौल बदल चुका है। एक वक्त था जब सीबीआई (CBI) को ‘सरकारी तोता’ कहा जाता था और उस समय की विपक्ष आज की सत्ताधारी पार्टी उसका मजाक उड़ाती थी। आज वही संस्थाएं किसके इशारे पर काम कर रही हैं, यह किसी से छिपा नहीं है। अरविंद केजरीवाल जैसे नेताओं की स्थिति देखकर अब जनता को यह संदेश स्पष्ट है—’सरकार के खिलाफ आवाज उठाई, तो ईडी (ED) और सीबीआई का सामना करना पड़ेगा’, चाहे आपके खिलाफ कोई ठोस सबूत हो या न हो।

क्या भारत में अब रहना है, तो हमें भाजपा और आरएसएस के इशारे पर ही चलना होगा? क्या लोकतंत्र का अर्थ अब केवल सत्ता की हाँ में हाँ मिलाना रह गया है?

सत्ता का अहंकार और जनता की जिम्मेदारी

ऐसा लगता है कि सत्ता के गलियारों में अब जनता के आगे झुकने की परंपरा खत्म हो गई है। जिस तरह से संस्थाओं का उपयोग किया जा रहा है, उससे यह आभास होता है कि भविष्य में एक ऐसी व्यवस्था बनाने की कोशिश है जहाँ सत्ता को कभी जनता के सवालों का जवाब न देना पड़े।

दोस्तों, यह संपादकीय किसी दल या नेता के विरोध में नहीं, बल्कि उस लोकतंत्र को बचाने की अपील है जिसके लिए हमारे पूर्वजों ने संघर्ष किया था। यदि आज हम चुप रहे, तो आने वाली पीढ़ियां हमें माफ नहीं करेंगी। हम एक ऐसे युग में प्रवेश कर रहे हैं जहाँ सच बोलना केवल साहस का काम नहीं, बल्कि ‘खतरे’ का काम बन गया है।

समय आ गया है कि हम अपनी चेतना को जगाएं। अगर हम अब नहीं जागे, तो कल इतिहास हमें केवल एक ‘मूकदर्शक’ के रूप में याद रखेगा, जिसने अपनी आँखों के सामने अपने अधिकारों को लुटते हुए देखा और फिर भी कुछ नहीं बोला।

लोकतंत्र जनता से चलता है, डर से नहीं। क्या आप अभी भी चुप रहना चाहते हैं?


यह लेख आपके पाठकों के बीच एक गहरी संवेदना और विचार-मंथन पैदा करने के लिए तैयार किया गया है। क्या आप चाहते हैं कि मैं इसे और अधिक आक्रामक या थोड़ा संयमित बनाऊं?

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